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History of Holi: होली पर रंग लगाने की परंपरा क्यों पड़ी? प्रह्लाद से वृंदावन तक… कैसे बदला होली का स्वरूप

History of Holi: होली सिर्फ रंगों और मस्ती का त्योहार नहीं, बल्कि गहरी पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ा पर्व है. फाल्गुन पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह उत्सव बुराई पर अच्छाई की जीत, आस्था और विश्वास का प्रतीक है.

Published by Ranjana Sharma

History of Holi: होली को आज हम रंगों और मस्ती के त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसकी जड़ें गहरी पौराणिक कथाओं में छिपी हैं. फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व केवल एक-दूसरे को रंग लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आस्था, विश्वास और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है. समय के साथ इसका स्वरूप बदलता गया, लेकिन इसका आध्यात्मिक आधार आज भी उतना ही मजबूत है.

होलिका दहन की कथा

होली से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकश्यपु की है. हिरण्यकश्यपु एक अत्याचारी राजा था, जो स्वयं को ईश्वर मानता था. लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था. यह बात हिरण्यकश्यपु को पसंद नहीं आई और उसने अपने ही पुत्र को दंडित करने का निर्णय लिया. उसने अपनी बहन होलिका की मदद ली, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था. योजना यह थी कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठेगी और प्रह्लाद जल जाएगा. लेकिन ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई. इसी घटना की याद में होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है.

नरसिंह अवतार

प्रह्लाद की भक्ति और हिरण्यकश्यपु के अहंकार का अंत भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से हुआ. मान्यता है कि वे खंभे से प्रकट हुए और उन्होंने हिरण्यकश्यपु का वध किया. यह प्रसंग होली को सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की स्थापना का प्रतीक भी बनाता है.

कंस का भय और श्रीकृष्ण का जन्म

होली की परंपरा का संबंध एक अन्य कथा से भी जोड़ा जाता है. मथुरा का अत्याचारी राजा कंस अपनी बहन देवकी से प्रेम करता था, लेकिन आकाशवाणी में यह सुनकर कि देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी, वह डर गया. उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया और उनकी संतानों का वध कर डाला. जब आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तो वासुदेव उन्हें गोकुल पहुंचाने में सफल रहे. कंस को जब इस बात का पता चला, तो उसने पूतना नामक राक्षसी को बालक कृष्ण को मारने के लिए भेजा. पूतना का दूध पीकर भगवान कृष्ण का रंग नीला पड़ गया. 

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ऐसे शुरू हुई रंग लगाने की परंपरा

लोककथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण का रंग गहरा नीला था और वे इसे लेकर चिंतित रहते थे कि क्या राधा उन्हें स्वीकार करेंगी. तब माता यशोदा ने उन्हें समझाया कि वे राधा को भी अपने रंग में रंग दें. इसके बाद कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेला. माना जाता है कि यहीं से रंगों वाली होली की परंपरा की शुरुआत हुई.

वृंदावन से पूरे देश तक

वृंदावन और गोकुल की गलियों में शुरू हुआ यह रंगोत्सव धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया. अब होली केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रेम, भाईचारे और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक बन चुकी है.

आस्था से उत्सव तक का सफर

नरसिंह अवतार की कथा से लेकर राधा-कृष्ण की रास तक, होली का स्वरूप समय के साथ बदलता गया. आज यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत, प्रेम की स्वीकृति और रंगों के माध्यम से दिलों को जोड़ने का संदेश देता है. इसीलिए फाल्गुन पूर्णिमा के दिन जब रंग उड़ते हैं, तो वह केवल मस्ती नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं और कथाओं की याद भी साथ लाते हैं.

Ranjana Sharma
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