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साड़ी की ऐतिहासिक यात्रा, प्राचीन से लेकर वैश्वि भर में कैसे बनी ग्लोबल फैशन?

साड़ी (Saree) केवल छह गज का कपड़ा नहीं है, बल्कि यह भारत की जीवंत विरासत (Living Heritage of India) का प्रतीक माना जाता है, जो आज पूरी विश्वभर में फैशन के (Global Fashion) मामले में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है.

Published by DARSHNA DEEP

Tracing the Journey of India’s Most Iconic Attire: साड़ी भारत की सांस्कृतिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा में से एक माना जाता है.  प्राचीन काल के साधारण सूती पहनावे से लेकर आज के डिजाइनर अवतार तक, इसने अपनी गरिमा सदियों से बना रखी है. इतना ही नहीं, बनारसी की भव्यता हो या बांधनी की जीवंतता, हर साड़ी अपनी मिट्टी की कहानी कहती है और भारतीय नारीत्व की विविधता को भी पूरी तरह से दर्शाने का काम करती है. 

कब से चलती आ रही है साड़ी की परंपराएं?

दरअसल, साड़ी की जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता यानी 2800-1800 ईसा पूर्व में देखने को मिलेगी. जहां, सूती कपड़ों के प्रमाण मिले थे. तो वहीं, दूसरी तरफ  प्राचीन काल में इसे ‘सत्तिका’ के नाम से जाना जाता था. हालाँकि, बढ़ते समय के साथ-साथ मुग़ल काल में फारसी कला के प्रभाव से इसमें ‘ज़रदोज़ी’ और ‘कढ़ाई’ को जोड़ने का काम किया गया. लेकिन, 19वीं सदी के आते ही ‘निवी स्टाइल’ (जो हम आज पहनते हैं)  वह महिलाओं के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय होते गई. आज, साड़ी विश्वभर में ग्लोबल फैशन के नाम से जानी जाती है. जिससे पेरिस और न्यूयॉर्क के फैशन शो में आधुनिक ट्विस्ट (जैसे साड़ी-गाउन) के साथ मैच करके पहना जा सकता है. 

साड़ी के लोकप्रिय प्रकार और विशेषताएं

दरअसल, भारतीय साड़ियां अपनी बनावट और डिज़ाइन के लिए पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा मशहूर है. उत्तर प्रदेश में बनारसी साड़ी अपने आप में ही सबसे ज्यादा खास है. दरअसल, यह अपनी भव्यता के लिए जानी जाती है. असली सोने और चांदी के तारों (ज़री) से बनी यह रेशमी साड़ी अपनी जटिल बुनाई और ‘बूटी’ डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध है. तो वहीं, कांजीवरम को दक्षिण भारत की शान भी कहा जाता है. इसके अलावा, इसकी रेशम बहुत भारी और मजबूत होती है, जिसमें मंदिर के किनारे (Temple Borders) और पौराणिक कथाओं के चित्र को साड़ी पर बड़े ही सुंदर तरीके से उतारा जाता है. 

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इसके अलावा, मध्य प्रदेश की चंदेरी अपनी हल्की बनावट (Sheer texture) के लिए भी विश्वभर में जानी जाती है. तो वहीं, दूसरी तरफ सूती और रेशम के मिश्रण से बनी यह साड़ी गर्मियों के लिए बेहतरीन और दिखने में राजसी होती है. लेकिन, महाराष्ट्र की पैठणी साड़ी का अलग ही लुक देखने को मिलता है. दरअसल, इस साड़ी की विशेषता इसका मोर वाला पल्लू लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने का सबसे ज्यादा खास काम करता है. 

तो वहीं, गुजरात/राजस्थान में बांधनी साड़ी सबसे ज्यादा लोकप्रिया मानी जाती है, जो सदियों से चली आ रही है.  यह ‘टाई एंड डाई’ (Tie and Dye) तकनीक से बनती है, जिसमें कपड़े को धागे से बांधकर रंगा जाता है, जिससे सुंदर डॉट्स और पैटर्न बन जाते हैं. 

साड़ी क्यों है भारतीय संस्कृति की पहचान

साड़ी भारत की सांस्कृतिक पहचान का सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा में से एक है. सदियों से चलती आ रही है साड़ी की परंपरा आज पूरे विश्वभर में जानी जाती है. इतना ही नहीं,  प्राचीन काल के साधारण सूती पहनावे से लेकर आज के डिजाइनर अवतार तक, इसने अपनी गरिमा लगातार बनाए रखी है.  

DARSHNA DEEP

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