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Exclusive: धराली आपदा के बाद अपनों को ढूंढ़ रहीं निराश आँखें… कुछ के शव हुए बरामद, कुछ की अभी भी तलाश जारी; जाने क्या है अब वहां की स्थिती?

Uttarakhand Cloudburst: उत्तराखंड के  उत्तरकाशी जिले के धराली में आई भीषण जल प्रलय के बाद लोग अपनों को ढूंढ रहे हैं। कुछ शवों का मिलना और बाकी लोगों का लापता होना,ये  हृदय विदारक घटना सभी को रूला गई। सरकार ने आधिकारिक रूप से लापता लोगों की संख्या 42 बताई है, जबकि 2 शव बरामद किए जा चुके हैं।

Published by Shubahm Srivastava

देहरादून (संजय श्रीवास्तव): उत्तराखंड के  उत्तरकाशी जिले के धराली में आई भीषण जल प्रलय के बाद लोग अपनों को ढूंढ रहे हैं। कुछ शवों का मिलना और बाकी लोगों का लापता होना,ये  हृदय विदारक घटना सभी को रूला गई। सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। सरकार ने आधिकारिक रूप से लापता लोगों की संख्या 42 बताई है, जबकि 2 शव बरामद किए जा चुके हैं।

इसके अलावा 98 लोगों को 5-5 लाख रुपये की तात्कालिक सहायता देने की घोषणा भी की गई है। यह गणित समझ से परे है, क्योंकि सहायता पाने वालों की संख्या और लापता या मृत घोषित लोगों का आंकड़ा मेल नहीं खा रहा।

बाढ़ के वक्त धराली में लगा हुआ था मेला

आपदा के समय धराली में मेला लगा हुआ था और देवता की पूजा चल रही थी। उसी समय 5 अगस्त की दोपहर में  तेज़ रफ्तार मलबे का सैलाब, सामने से आती गर्जना और पलक झपकते ही पक्की इमारतें ऐसे ढहतीं जैसे किसी ने रेत का महल तोड़ दिया हो। धराली आपदा का वीडियो इस त्रासदी की भयावह सच्चाई उजागर करता है। उफान मारते पानी ने एक-एक कर कई होमस्टे और होटलों को ऐसे बहा दिया मानो वे कागज़ के खिलौने हों।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज जहां सिर्फ मलबा बचा है, वहां आपदा से पहले कितने होमस्टे, होटल या अन्य इमारतें , घर मौजूद थे, इसकी ठोस जानकारी कहीं न कहीं स्थानीय प्रशासन के रिकॉर्ड में जरूर होगी जिसे पता करना होगा । स्थानीय लोगों का कहना है कि इनमें से कई इमारतें उस वक्त खाली नहीं थीं—किसी में मालिक मौजूद थे, तो कहीं पर्यटक या कर्मचारी ठहरे हुए थे। फिर भी, इन ढांचों और उनमें मौजूद लोगों की सटीक जानकारी प्रशासन के पास नहीं है या वह साझा नहीं की जा रही।

नेपाली मजदूरों का कुछ पता नहीं

धराली और आसपास के कई निर्माणाधीन स्थलों पर बड़ी संख्या में नेपाली मजदूर भी काम कर रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि इनमें से कुछ मजदूर आपदा के बाद नेपाल लौट गए, लेकिन बाकी का अब तक कोई पता नहीं चला।

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स्थानीय निवासियों का कहना है कि जल प्रलय ने किसी को संभलने का मौका ही नहीं दिया। पानी का तेज बहाव और मलबे ने लोगों को वहीं दबा दिया जहां वे खड़े थे। कई मकान, होटल, दुकानों और निर्माण साइटों पर काम करने वाले लोग उसी मलबे में समा गए।

राहत बचाव कार्य पर उठ रहे सवाल

सरकारी मशीनरी का दावा है कि राहत और बचाव कार्य लगातार जारी है और प्रभावित क्षेत्रों की गहन छानबीन की जा रही है। लेकिन धराली के लोग मानते हैं कि सरकार ने वास्तविक स्थिति का सही तरीके से आकलन नहीं किया। कई परिजनों को अब तक अपने लापता संबंधियों के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिली है, जिससे बचाव और राहत कार्य संदेह के घेरे में है। समय रहते अधिकारियों को कार्य पद्धति को सुधारना होगा मुख्यमंत्री की भावनाओं के अनुरूप कार्य को अंजाम देना होगा नहीं तो धामी की मेहनत धरी की धरी रह जाएगी।

लोगों की आपदा प्रबंधन विभाग को सलाह

स्थानीय समाजसेवियों का कहना है कि आपदा प्रबंधन विभाग को चाहिए कि वह जमीन पर मौजूद टीमों की रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान को गंभीरता से ले, ताकि असल आंकड़े सामने आ सकें। केवल कागजों में राहत और मुआवजे का वितरण दिखाने से पीड़ित परिवारों का दर्द कम नहीं होगा।

धराली त्रासदी सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि सरकारी आंकड़ों और सच्चाई के बीच के अंतर का भी उदाहरण बन गई है। सवाल यह है कि क्या सरकार इन संख्याओं के पीछे छिपी सच्चाई उजागर करेगी, या फिर यह भी अन्य आपदाओं की तरह धीरे-धीरे लोगों की यादों में धुंधली हो जाएगी।

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Shubahm Srivastava
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