Bihar SIR: बिहार में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड को निवास का अंतिम और पक्का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह फैसला उस वक्त आया जब राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के वरिष्ठ नेता मनोज झा की याचिका पर सुनवाई हो रही थी।
इस मामले में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में कहा कि आम नागरिकों के पास आधार, राशन कार्ड और EPIC (मतदाता पहचान पत्र) जैसे दस्तावेज हैं, लेकिन इसके बावजूद अधिकारियों द्वारा उन्हें निवास प्रमाण के रूप में मान्यता नहीं दी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: दस्तावेज प्रमाण हैं, लेकिन निर्णायक नहीं
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ कहा कि “ये दस्तावेज इस बात का संकेत जरूर देते हैं कि कोई व्यक्ति किस क्षेत्र में रह रहा है, लेकिन इन्हें अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।” साथ ही जस्टिस जॉयमाला बागची ने भी इस पर सहमति जताई।
कपिल सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि मतदाता सूची में गंभीर खामियां हैं — कहीं मृत लोगों को जीवित दिखाया गया है तो कहीं जीवित लोगों को मृत बता दिया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है।
चुनाव आयोग की सफाई: त्रुटियों को सुधारा जाएगा
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कोर्ट में कहा कि इस तरह के बड़े स्तर पर काम में कुछ गलतियां होना सामान्य है, लेकिन 30 सितंबर को अंतिम मतदाता सूची जारी होने से पहले सभी त्रुटियों को सुधार लिया जाएगा।
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विपक्ष की चिंता: करोड़ों वोटर हो सकते हैं बाहर
विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि 1 अगस्त को जारी मसौदा मतदाता सूची में लाखों-करोड़ों वैध मतदाताओं के नाम गायब हैं। इससे उनका मताधिकार छिन सकता है, जो कि लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
इस मुद्दे को लेकर RJD, TMC, कांग्रेस, NCP, CPI, शिवसेना (उद्धव गुट), JMM, CPI (ML) जैसे बड़े दलों ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इनके साथ PUCL, ADR और योगेंद्र यादव जैसे सामाजिक संगठनों ने भी चिंता जताई है।
वोटर सूची की पारदर्शिता सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करती है। यदि आधार कार्ड जैसे दस्तावेज को अंतिम प्रमाण नहीं माना जाएगा, तो आम नागरिकों के पास वैकल्पिक दस्तावेजों की स्पष्ट जानकारी और प्रक्रिया होनी चाहिए।
बिहार की यह SIR प्रक्रिया आने वाले समय में देशभर के लिए एक मिसाल बन सकती है — लेकिन तभी, जब इसमें विश्वसनीयता और निष्पक्षता बनी रहे।