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MP News: संविदा कर्मियों की जंग : वादों से हकीकत तक सामुहीक ज्ञापन मुख्यमंत्री के नाम

MP News: संविदा कर्मियों की जंग : वादों से हकीकत तक सामुहिक ज्ञापन मुख्यमंत्री के नाम, संविदा कर्मियों का संघर्ष वर्षों से जारी है। सरकारें आती-जाती रहीं, घोषणाएँ होती रहीं, लेकिन संविदा कर्मचारियों की समस्याएँ जस की तस हैं

Published by Swarnim Suprakash

टीकमगढ़ से दीपक अग्रवाल की रिपोर्ट 
MP News: संविदा कर्मियों का संघर्ष वर्षों से जारी है। सरकारें आती-जाती रहीं, घोषणाएँ होती रहीं, लेकिन संविदा कर्मचारियों की समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं। हाल ही में संविदा संयुक्त संघर्ष मंच ने मुख्यमंत्री को दो पन्नों का ज्ञापन सौंपकर एक बार फिर अपनी मांगें सामने रखी हैं। यह ज्ञापन सिर्फ एक औपचारिक कागज़ नहीं बल्कि उन लाखों संविदा कर्मचारियों की पीड़ा का दस्तावेज है जो रोज़ाना असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य के साथ जी रहे हैं।

सरकार की घोषणाएँ और हकीकत का फासला

4 जुलाई 2023 को मुख्यमंत्री द्वारा पंचायतों में संविदा कर्मियों को लेकर बड़े-बड़े ऐलान किए गए। इसके बाद 22 जुलाई 2023 को सामान्य प्रशासन विभाग ने संविदा नीति 2023 जारी की। जब मुख्यमंत्री जी की घोषणाएं इस नीति के माध्यम से कागज पर उतरी तो उसमें घोषणा का मुख्य बिंदु “अब हर साल अनुबंध की प्रक्रिया समाप्त होगी” नीति से गायब था, संविदा कर्मचारियों की ढाई दशक की सीनियरटी ख़त्म कर दी, नियमित कर्मचारियों के समान मंहगाई भत्ता नहीं दिया और न ही नियमित कर्मचारियों के समान अवकाश मिले। इसके साथ ही 3 वर्ष बीत जाने के बावजूद विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के ई-गवर्नेंस अमले, सामाजिक न्याय विभाग, विकलांग पुनर्वास केंद्र और कृषि विभाग आत्मा प्रोजेक्ट में आज तक नीति लागू नहीं हो पाई, जहाँ लागू हुई वहां भी हर विभाग में विसंगतियां हैं, यही कारण है कि संविदा संयुक्त मंच को फिर से सड़क से लेकर शासन स्तर तक आवाज़ बुलंद करनी पड़ रही है।

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मांगें वाजिब फिर भी सरकार की चुप्पी क्यों

संविदा कर्मियों की प्रमुख मांगें हैं – जिन विभागों में नीति लागू नहीं हुई उनमें एक साथ नीति लागू करने की तारीख निर्धारित की जाये, मुख्यमंत्री जी की  घोषणा अनुसार संविदा पर कार्य करने की अधिकतम आयु 65  वर्ष तक का सीधा एक अनुबंध हो ,नियमित कर्मचारियों के समान महँगाई भत्ता,अवकाश  व चिकित्सा सुविधा, भर्ती प्रक्रिया में 50 प्रतिशत पद सीनियरटी के आधार पर सीधे भरे जाए, 10 वर्ष से अधिक से कार्यरत संविदा कर्मचारियों का नियमितीकरण प्रारंभ किया जाए । ये सभी मांगें न तो अव्यावहारिक हैं और न ही असंभव। बल्कि यह वह न्यूनतम अधिकार हैं जो किसी भी कर्मचारी को उसके समर्पित श्रम के बदले मिलना चाहिए।

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प्रशासनिक लापरवाही और ठंडे बस्ते की राजनीति

ज्ञापन में स्पष्ट उल्लेख है कि संविदा नीति पर विभागीय स्तर पर अमल नहीं किया गया। यह स्थिति बताती है कि सरकार की घोषणाएँ सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित रह जाती हैं और विभागीय अफसरशाही उन्हें ठंडे बस्ते में डाल देती है। यही कारण है कि संविदा कर्मियों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है।

कर्मचारी असुरक्षा से समाज पर असर

1995 से मध्यप्रदेश में शुरू हुई संविदा व्यवस्था से आज ये स्थिति है कि संविदा कर्मचारी ई-गवर्नेंस, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, पंचायत, नगरीय निकाय और विभिन्न विभागों की रीढ़ हैं और नियमित कर्मचारियों से कहीं अधिक संख्या संविदा कर्मचारियों कि है । इनके भरोसे योजनाएँ और सेवाएँ गाँव-गाँव तक पहुँचती हैं। जब ये कर्मचारी खुद असुरक्षा में रहेंगे तो व्यवस्था की गुणवत्ता पर भी असर पड़ेगा। एक असंतुष्ट और असुरक्षित कर्मचारी से बेहतर सेवाओं की उम्मीद करना अन्याय ही है।

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सरकार की अग्निपरीक्षा

विधानसभा चुनावों के दौरान सरकार ने संविदा कर्मियों को स्थायी करने का वादा किया था। अब जबकि चुनाव बीत चुके हैं, संविदा कर्मी फिर से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यदि सरकार ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए तो यह असंतोष आंदोलन का रूप लेगा, जिसकी गूँज सिर्फ़ प्रशासनिक गलियारों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि राजनीतिक असर भी डालेगी।
संविदा कर्मियों की मांगें मानवीय और संवैधानिक दृष्टि से न्यायसंगत भी है और तर्कसंगत भी। सरकार को चाहिए कि तुरंत संविदा नीति 2023 पर अमल करे और इन कर्मियों को स्थायीकरण, वेतनवृद्धि तथा सेवा सुरक्षा प्रदान करे। संविदा कर्मियों की उपेक्षा दरअसल उस व्यवस्था की उपेक्षा है, जिस पर आमजन का भरोसा टिका है।
यह समय है कि सरकार संविदा कर्मचारियों को “अस्थायी बोझ” न समझकर “स्थायी सहारा” बनाए।

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