Ajmer Sharif Dargah: राजस्थान के अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को लेकर एक दायर जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. याचिका में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर प्रधानमंत्री ऑफिस की ओर से हर साल चढ़ाई जाने वाली चादर की परंपरा पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई थी.
विश्व वैदिक सनातन संघ के प्रमुख जितेंद्र सिंह और विष्णु गुप्ता ने याचिका दायर की थी. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका को खारिज की. सुनवाई के दौरान याचिककर्ता के वकील वरुण सिन्हा ने कहा मेरा मुकदमा दीवानी अदालत में लंबित है.
याचिककर्ता के वकील ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि चादर चढ़ाने के इस मामले में कोर्ट ने 1961 में फैसला सुनाया था कि यह स्थान धार्मिक स्थल नहीं बल्कि चिश्तिया संप्रदाय का इलाका है. CJI ने कहा कि यह विचारणीय मुद्दा नहीं है, रिट याचिका खारिज की जाती है. साथ ही CJI ने कहा कि इस आदेश का लंबित दीवानी मुकदमे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. दीवानी मामला चलता रहेगा.
बता दें कि विश्व वैदिक सनातन संघ के प्रमुख जितेंद्र सिंह बिसेन और हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर सालाना उर्स के दौरान प्रधानमंत्री और अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की तरफ से चादर भेजे जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई थी.
याचिका में दी गई थी ये दलील
याचिका में मांग की गई थी कि दरगाह पर सालाना उर्स के दौरान सरकारी स्तर पर भेजी जाने वाली चादर पर तत्काल रोक लगाई जाए. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का इस तरह किसी धार्मिक स्थल से जुड़ा आयोजन सरकारी तटस्थता के सिद्धांत के खिलाफ है.
मंदिर होने का किया गया दावा
जनहित याचिका में यह भी दावा किया गया था कि अजमेर शहर का वास्तविक नाम ‘अजय मेरु’ है और यहां संकट मोचन महादेव विराजमान हैं. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जिस स्थान पर दरगाह है, वहां पहले मंदिर था. इसी आधार पर उनकी ओर से सरकारी स्तर पर दरगाह को सम्मान देने पर आपत्ति जताई गई थी.