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Eating disorders: खाने की आदत नहीं, गंभीर बीमारी हैं ईटिंग डिसऑर्डर, ये संकेत न करें नजरअंदाज

Eating disorders: ईटिंग डिसऑर्डर यानी खाने से जुड़े विकार गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जो व्यक्ति के खान-पान के व्यवहार, सोच और भावनाओं को प्रभावित करते हैं. एनोरेक्सिया, बुलिमिया, बिंज-ईटिंग, एआरएफआईडी, पिका और रूमिनेशन डिसऑर्डर इसके प्रमुख प्रकार हैं.

By: Ranjana Sharma | Last Updated: February 28, 2026 2:42:01 PM IST



Eating disorders: खाने से जुड़े विकार, जिन्हें चिकित्सकीय भाषा में ईटिंग डिसऑर्डर कहा जाता है, आज के समय में तेजी से सामने आ रही गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल हैं. ये केवल खाने की खराब आदतें नहीं बल्कि ऐसे मनोवैज्ञानिक विकार हैं, जो व्यक्ति की सोच, भावनाओं और व्यवहार को गहराई से प्रभावित करते हैं. डाक्टरों का मानना है कि ईटिंग डिसऑर्डर किसी भी उम्र, लिंग या सामाजिक वर्ग के लोगों को प्रभावित कर सकते हैं और समय पर इलाज न मिलने पर ये शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर गंभीर परिणाम दे सकते हैं.

ईटिंग डिसऑर्डर के प्रकार

ईटिंग डिसऑर्डर के कई प्रकार होते हैं. एनोरेक्सिया नर्वोसा में व्यक्ति को वजन बढ़ने का अत्यधिक डर होता है. वह बेहद कम खाना खाता है और खुद को मोटा समझता है, जबकि उसका वजन सामान्य से काफी कम हो सकता है. यह स्थिति कुपोषण, कमजोरी, हार्मोन असंतुलन और हृदय संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती है. वहीं बुलिमिया नर्वोसा में व्यक्ति एक बार में बहुत अधिक खाना खा लेता है और फिर वजन बढ़ने के डर से उल्टी कर देता है, अत्यधिक व्यायाम करता है या लैक्सेटिव्स का इस्तेमाल करता है. इससे दांतों को नुकसान, गले में सूजन, डिहाइड्रेशन और शरीर में इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

ईटिंग डिसऑर्डर  के नुकसान

बिंज-ईटिंग डिसऑर्डर में भी व्यक्ति बार-बार बहुत ज्यादा खाना खाता है, लेकिन वह बुलिमिया की तरह उसे बाहर निकालने की कोशिश नहीं करता. इस वजह से मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ जाता है. एआरएफआईडी यानी अवॉइडेंट/रिस्ट्रिक्टिव फूड इंटेक डिसऑर्डर में व्यक्ति कुछ खास खाद्य पदार्थों से बचता है या बहुत सीमित मात्रा में भोजन करता है. यह शरीर की छवि से जुड़ा नहीं होता, बल्कि स्वाद, बनावट या किसी डर के कारण होता है. इससे पोषण की कमी और बच्चों में विकास रुकने की आशंका रहती है. पिका नामक विकार में व्यक्ति मिट्टी, चॉक, कागज या अन्य गैर-खाद्य वस्तुएं खाने लगता है, जो संक्रमण या विषाक्तता का कारण बन सकता है. वहीं रूमिनेशन डिसऑर्डर में व्यक्ति खाया हुआ भोजन अनजाने में बार-बार मुंह में वापस लाता है और दोबारा चबाता या थूक देता है, जिससे कुपोषण और वजन कम होने की समस्या हो सकती है.

ईटिंग डिसऑर्डर के कारण

इन विकारों के पीछे कई कारण हो सकते हैं. शरीर की छवि को लेकर असंतोष, सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट बॉडी’ का दबाव, डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी मानसिक समस्याएं, पारिवारिक तनाव, आनुवंशिक कारण या बचपन का कोई मानसिक आघात इनमें अहम भूमिका निभा सकते हैं. कुछ चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जैसे अचानक वजन कम या ज्यादा होना, खाना छिपाकर खाना, भोजन के तुरंत बाद बाथरूम जाना, शरीर को लेकर अत्यधिक असंतोष, बार-बार डाइटिंग या जरूरत से ज्यादा व्यायाम करना, लगातार थकान या बच्चों में विकास रुकना.

चेतावनी संकेत जिन्हें नजरअंदाज न करें

डाक्टरों के अनुसार, ईटिंग डिसऑर्डर का इलाज संभव है, लेकिन इसके लिए समय और धैर्य की आवश्यकता होती है. मनोचिकित्सा, खासकर कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी, नकारात्मक सोच और व्यवहार को बदलने में मदद करती है. पोषण विशेषज्ञ संतुलित आहार की योजना बनाते हैं, जबकि जरूरत पड़ने पर डिप्रेशन या एंग्जायटी के लिए दवाइयां भी दी जाती हैं. गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती कर उपचार करना पड़ सकता है. ईटिंग डिसऑर्डर को हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह केवल खाने का मामला नहीं बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर स्थिति है. समय पर पहचान, पेशेवर मदद और परिवार का सहयोग किसी भी व्यक्ति को इस समस्या से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

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