Dr. Akshita Gupta: अस्पताल की भागदौड़, इमरजेंसी वार्ड का दबाव, 14 घंटे की थका देने वाली शिफ्ट और इंटर्नशिप की जिम्मेदारियां-इन सबके बीच अगर कोई देश की सबसे कठिन परीक्षा में पहले ही प्रयास में शानदार रैंक हासिल कर ले, तो यह सिर्फ सफलता नहीं बल्कि अनुशासन और इच्छाशक्ति की मिसाल बन जाती है. पंचकूला की रहने वाली डॉ. अक्षिता गुप्ता ने एमबीबीएस डॉक्टर के रूप में काम करते हुए वर्ष 2020 में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 69 हासिल कर यह साबित कर दिया कि सीमित समय भी बड़ी उपलब्धि का आधार बन सकता है.
15-15 मिनट के ब्रेक ने बदली किस्मत
डॉ. अक्षिता की तैयारी का सबसे खास पहलू था समय का सही उपयोग. उनके पास घंटों बैठकर पढ़ाई करने का अवसर नहीं था, इसलिए उन्होंने छोटे-छोटे समय खंडों को ही अपनी ताकत बना लिया. अस्पताल में ड्यूटी के दौरान मिलने वाले 15-15 मिनट के ब्रेक उनके लिए आराम का नहीं, बल्कि रिवीजन का समय होते थे. वे अपनी जेब में छोटे-छोटे नोट्स रखती थीं, जिन्हें मौका मिलते ही पढ़ लेती थीं. इन नोट्स को तैयार करने के लिए उन्होंने अपनी मेडिकल की किताबों से सिलेबस से जुड़े जरूरी हिस्सों को अलग कर कॉम्पैक्ट रूप दिया, ताकि कम समय में ज्यादा प्रभावी तैयारी हो सके.
मेडिकल साइंस को वैकल्पिक विषय चुना
उन्होंने मेडिकल साइंस को अपना वैकल्पिक विषय चुना, जिससे उन्हें अपने पहले से मौजूद ज्ञान का लाभ मिला. एमबीबीएस के तीसरे वर्ष से ही उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी थी. इससे उन्हें इंटर्नशिप के दौरान रणनीतिक बढ़त मिली. उनका मानना था कि यूपीएससी में अंधाधुंध पढ़ाई से ज्यादा जरूरी है सिलेबस की समझ और सीमित संसाधनों का बार-बार दोहराव. यही कारण रहा कि उन्होंने अपने कमजोर विषयों पर विशेष ध्यान दिया और संतुलित तैयारी की.
अनुशासित दिनचर्या अपनाई
ड्यूटी से लौटने के बाद की रातें उनके लिए रिवीजन का समय होती थीं. थकान के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य को प्राथमिकता दी. सोशल मीडिया और अनावश्यक गतिविधियों से दूरी बनाकर उन्होंने अनुशासित दिनचर्या अपनाई. डॉक्टर के रूप में वे मरीजों की सेवा कर रही थीं, लेकिन उनका सपना था कि वे व्यापक स्तर पर समाज और व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव ला सकें. सिविल सेवा उनके लिए केवल एक प्रतिष्ठित पद नहीं, बल्कि जनसेवा का विस्तृत मंच था.
सफलता के लिए परिस्थितियां अनुकूल होना जरूरी नहीं
डॉ. अक्षिता गुप्ता की कहानी यह बताती है कि सफलता के लिए परिस्थितियां अनुकूल होना जरूरी नहीं, बल्कि लक्ष्य के प्रति स्पष्टता और रणनीति अधिक महत्वपूर्ण होती है. 14 घंटे की ड्यूटी और 15 मिनट के छोटे-छोटे ब्रेक के बीच तैयार हुई यह उपलब्धि उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित समय और संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं.