Lalu Yadav Story: जानें 8 मार्च, 1990 को लालू के एक फोन कॉल का सीक्रेट, फिर बदल गई बिहार की सियासत

lalu prasad yadav kunba: लालू प्रसाद यादव के कुनबे में 20 से अधिक सदस्य हैं, जबकि करीब-करीब आधे राजनीति में सक्रिय हैं. परिवार में लालू और राबड़ी दोनों ही बिहार के सीएम रह चुके हैं.

Published by JP Yadav

Lalu Yadav Story : भारतीय राजनीति में परिवारवाद का दबदबा रहा है. यह आजादी के 70 साल बाद भी कायम है. देश के कई परिवारों की राजनीति में अब भी तूती बोलती है. ऐसे परिवार एक नहीं बल्कि कई विधानसभा और लोकसभा सीटों को अपनी एक आवाज से प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. आजादी के बाद कई रसूखदार परिवारों ने राजनीति में कदम रखा और दशकों तक भारतीय राजनीति की धुरी बने रहे. इनमें जवाहर लाल नेहरू भी शामिल थे. यह अलग बात है नेहरू का परिवारवाद ‘गांधी’ के परिवार में तब्दील हो गया. इस तरह इंदिरा गांधी को राजनीति विरासत में मिली. इसके बाद यह पीढ़ी दर पीढ़ी जारी है. इसके अलावा भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे परिवार भी आए, जिन्होंने अपने संघर्ष से अपनी खास जगह बनाई. देश के करीब-करीब हर राज्य में ऐसे राजनीतिक परिवार सक्रिय हुए, जिनकी दूसरी या तीसरी-चौथी पीढ़ी सियासत में ना केवल सक्रिय है बल्कि उसे सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रही है. इस स्टोरी में हम बात करेंगे लालू प्रसाद यादव की, जिनकी धमक ढाई दशक बाद भी जारी है. 

तेजस्वी यादव : परिवारवाद की दूसरी पीढ़ी की दस्तक (Tejashwi Yadav: The second generation of nepotism arrives)

बिहार में कई परिवार हैं, जो राजनीति में कई पीढ़ियों से सक्रिय हैं. एक आंकड़ा बताता है कि बिहार में 27 प्रतिशत पुरुष नेता और 57 प्रतिशत महिला नेता खानदानी हैं. यानी परिवारवाद ने इन्हें पाला, सींचा और अब आगे बढ़ा रहा है. बिहार के 27 प्रतिशत विधायकों के अलावा सांसद और विधान पार्षद किसी ना किसी राजनीतिक परिवार से आते हैं. बिहार की करीब 57 प्रतिशत महिला जनप्रतिनिधियों का संबंध भी किसी ना किसी राजनीतिक परिवार से है.  एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (Association of Democratic Reforms) की रिपोर्ट तो और भी चौंकाती है, जो यह बताता है कि देश के उन राज्यों में बिहार चौथे नंबर पर आता है जहां परिवार/वंशवाद की जड़ें सबसे गहरी हैं. ऐसे में बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का परिवार वर्तमान में सबसे ज्यादा रसूखदार है. लालू परिवार की दूसरी पीढ़ी राजनीति में स्थापित हो चुकी है. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने परिवारवाद की विरासत संभाल ली है. बिहार में महागठबंधन जीता तो कथित तौर पर तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं. 

कर्पूरी ठाकुर ने दिखाई पिछड़ों को राह (Karpoori Thakur showed the way to the backward classes)

तेजस्वी यादव को बेशक परिवारवाद की देन कहा जा सकता है, लेकिन लालू प्रसाद यादव ने बिहार में अपनी राजनीतिक ज़मीन खुद तैयार की है. बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत के साथ ही जातीय राजनीति हावी हो गई. शुरुआती दौर में बिहार में सवर्ण वर्ग के इर्दगिर्द सत्ता का ध्रुवीकरण होता रहा. यह बात भी सच है कि पिछड़ों में सत्ता हासिल करने की भूख हमेशा रही. आजादी के बाद पहली बार बिहार विधानसभा चुनाव हुआ तो राज्य में कांग्रेस को सत्ता मिली, जिसमें ऊंची जातियों का कब्जा था. कुछ सालों के बाद ही बिहार में कांग्रेस को संचालित करने वाली ये ऊंची जातियां सत्ता संघर्ष के लिए आपस में ही लड़ने लगीं. कई ऊंची जातियों के नाम पर वोट बैंक बनने लगे.

देश की आजादी के 5 साल बाद ही यानी वर्ष 1952 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद ही कांग्रेस के प्रति झुकाव रखने वालीं पिछड़ी जातियों ने भी अलग से एक गुट बना डाला. सत्ता में भागेदारी के लिए बने इस गुट का नाम रखा गया ‘त्रिवेणी संघ’. त्रिवेणी संघ भी जातीय गोलबंदी के चलते ऊंची जातियों की तर्ज पर ही संचालित होने लगा. पिछड़ी/निचली जातियों की बात करें तो 1970 के दशक तक आते-आते पिछड़ी जातियां संगठित हुईं. पिछड़ी/निचली जातियों में एक बड़ा नाम था-कर्पूरी ठाकुर, जिन्होंने गरीबों के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी. इसका परिणाम यह हुआ कि जनता ने कर्पूरी ठाकुर को 2 बार बिहार का मुख्यमंत्री बनाया. ऐसे में लालू प्रसाद यादव ने कर्पूरी ठाकुर की तर्ज पर पिछड़ों की राजनीति की और 3 बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. इसमें यह भी अहम है कि कर्पूरी ठाकुर और लालू प्रसाद यादव ने अलग-अलग समय और परिस्थिति में बिहार में राजनीति की और सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे. 

लालू ने संघर्ष को देखा था नजदीक से (Lalu had seen the struggle closely)

 11 जून, 1948 को बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में एक साधारण यादव परिवार में जन्में लालू प्रसाद यादव के कई मुख्यमंत्री बनने का सफर उतना आसान नहीं रहा है, जितना दिखता है. लालू ने यहां तक पहुंचने के लिए खुद में वह जज्बा पैदा किया जो मेहनत, प्रेरणा, हिम्मत और संघर्ष से भरा था. गांव में पिता कुंदन राय के पास बमुश्किल 2 बीघा जमीन थी. इससे ही पूरा परिवार पलता था. लालू यादव भाई-बहनों में छठे नंबर पर हैं. लालू परिवार में सबसे छोटे भाई शुकदेव यादव हैं, जो आज भी जीवित हैं. वे लालू यादव के इकलौते भाई हैं जो अब तक जीवित हैं. परिवार में सबसे बड़े भाई गुलाब यादव, मुकुंद यादव, महावीर यादव, गंगोत्री देवी, लालू प्रसाद यादव और शुकदेव यादव हैं.

लालू के बड़े भाई ने एक बार मीडिया से बात करते हुए कबूला था कि गांव में उनका मामूली सा घर था, जो बारिश में अपनी हीनता की कहानी बयां कर देता था. खेती बहुत ही कम थी, इसलिए लालू  और उनके भाई-बहन गांव में मवेशी चराते और परिवार के काम में हाथ बंटाते थे. यह भी दिलचस्प है कि लालू प्रसाद यादव शुरुआती दौर में राजनीति में आने के इच्छुक नहीं थे बल्कि वह  बिहार पुलिस में सिपाही बनकर परिवार का आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चाहते थे. लालू ने परिवार में गरीबी देखी और आर्थिक अभाव में कई भूखे पेट भी सोए. माता-पिता को दो वक्त के लिए संघर्ष करते बेहद नजदीकी से देखा. वह चाहते थे कि सरकारी नौकरी करें और परिवार को मजबूती दें. 

ऑनरेरी डॉक्टरेट डिग्री ठुकराई थी लालू प्रसाद यादव ने (Lalu Prasad Yadav rejected honorary doctorate degree)

परिवार के लिए एक मजबूत सहारा थे- महावीर राय. वह पटना के वेटनरी कॉलेज में नौकरी करते थे और परिवार की आर्थिक मदद में उनका अहम योगदान था. लालू प्रसाद यादव ने गृह जिले गोपालगंज के फुलवरिया इलाके में स्थित माध्यमिक स्कूल से पढ़ाई की. परिवार लालू प्रसाद यादव की पढ़ाई के लिए चिंतित था, क्योंकि गांव में पढ़ाई-लिखाई का माहौल ही नहीं था. पिता के कहने पर लालू प्रसाद यादव अपने बड़े भाई महावीर राय के साथ पटना आ गए. यहां बड़े भाई के रहते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण की. लालू ने पटना यूनिवर्सिटी से बैचलर ऑफ़ लॉ की डिग्री हासिल की. इसके बाद आगे की पढ़ाई की कड़ी में उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी के बीएन कॉलेज से राजनीति शास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की. इस बात को बहुत कम लोग जानते होंगे कि लालू प्रसाद यादव ने कुछ दिनों तक पटना स्थित बिहार वेटेनरी कॉलेज में क्लर्क के रूप में भी काम किया था. हैरत तो यह है कि वर्ष 2004 में पटना यूनिवर्सिटी की ऑनरेरी डॉक्टरेट डिग्री को लालू प्रसाद यादव ने खुद अस्वीकार कर दिया था.

राजनीति नहीं थी लालू की पहली पसंद (Lalu Yadav’s first choice is not politics)

 लालू प्रसाद यादव राजनीति में नहीं आना चाहते थे. इसका जिक्र वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर की किताब ‘द ब्रदर्स बिहारी’ में मिलता है. लालू दरअसल बिहार पुलिस में सिपाही बनना चाहते थे. पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने और छात्र राजनीति में सक्रिय होने के दौरान लालू जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गए थे. वह तेजी से छात्र नेता के तौर पर अपनी पहचान भी बना रहे थे. बावजूद इसके वह राजनीति को करियर के रूप में अपनाना नहीं चाहते थे. आर्थिक अभाव को झेलने वाले लालू का सपना था कि वह बिहार पुलिस में सिपाही बनें और नौकरी करके परिवार की मदद करें, क्योंकि राजनीति में कोई आर्थिक भविष्य नहीं है.

इस बीच एक करीबी दोस्त की सलाह ने उनकी दुनिया ही बदल दी. पटना के बीएन कॉलेज में एक बड़े प्रदर्शन के दौरान लालू प्रसाद यादव को अनुपस्थित देखकर दोस्त हैरान रह गए. इस बीच अचानक ही लालू दिखे तो घायल अवस्था में. बदहवासी और परेशानी चेहरे पर साफ नजर आ रही थी. दोस्तों के पूछने पर उन्होंने बताया कि बिहार पुलिस की सिपाही भर्ती में हिस्सा लिया था. दौड़ के दौरान वह गिर गए तो चोट लग गई. इस दौरान कॉलेज के दोस्त नरेंद्र सिंह ने उन्हें समझाया कि उनका भविष्य सिपाही की वर्दी में नहीं, बल्कि बिहार की सक्रिय राजनीति में है. यह बात लालू के दिल को लग गई. इसके बाद लालू ने छात्र संघ चुनाव जीतने से लेकर बिहार का सीएम बनकर इतिहास रच दिया. 

1977 में जीता लोकसभा चुनाव (Lalu Prasad Yadav won 1977 Lok Sabha elections)

लालू प्रसाद यादव अपने बड़े भाई महावीर राय के पास पढ़ने के लिए आए, जो पटना के वेटेनरी कॉलेज में नौकरी करते थे. लालू ने पटना यूनिवर्सिटी से छात्र संघ की राजनीति की शुरुआत की. लालू प्रसाद यादव बचपन से ही मजाकिया स्वभाव के थे. उनका हास्य-विनोद (sense of humor) का अंदाज लोगों को अपनी ओर खींचता था. वह अपनी बात बहुत ही सहज भाव से लोगों तक पहुंचाने का हुनर रखते थे. छात्र राजनीति से ही वह अच्छा भाषण देने में माहिर हो गए थे. उनकी हाजिर जवाबी का लोहा उनके प्रतिद्वंद्वी भी मानते थे. 1970 में वह पटना यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनाव में महासचिव बने और फिर वर्ष 1973 में लालू ने अध्यक्ष पद का चुनाव जीता. छात्र राजनीति खत्म हुई नहीं कि वर्ष 1974 में वह जेपी आंदोलन में शामिल हो गए. इसमें उनके साथ नीतीश कुमार भी थे. नीतीश और लालू दोनों ही ने पटना यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनाव में अलग-अलग पद हासिल किए थे. 1977 में लालू प्रसाद यादव पूरी तरह बिहार की राजनीति में सक्रिय हो चुके थे. उन्होंने छपरा से जनता पार्टी से लोकसभा का चुनाव जीता और लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में दाखिल हुए. इसके बाद वर्ष 1980 और 1985 में विधानसभा चुनाव जीता.

मंडल ने किया लालू को राजनीति में स्थापित (Mandal established Lalu in politics)

 1990 के दशक में राजनीतिक उठपटक जारी थी. कुछ समय के लिए दौर शांति का था यानी तूफान की आहट का. भारतीय जनता पार्टी का उभार हो चुका था, लेकिन सिर्फ शहरों में सीमित थी. बात भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव की करें तो मंडल और कमंडल की राजनीति ने पूरे भारत का माहौल ही बदल दिया. 1990 के दशक में कमंडल से पहले मंडल आया था. उस समय केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई में गठबंधन की सरकार थी. वीपी ने एक क्रांतिकारी फैसला लेते हुए पिछड़ों को आरक्षण देने वाले मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कीं. इससे देश की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा. पिछड़ों की राजनीति शुरू हुई तो लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, चौधरी अजीत सिंह और नीतीश कुमार जैसे नेताओं का वर्चस्व भारतीय राजनीति में बढ़ने लगा. यह शुरुआत थी, इसलिए इन नेताओं को प्रांतीय या स्थानीय स्तर पर ही जाना जाता था. कुछ ही सालों के भीतर लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के साथ चौधरी देवी लाल और चौधरी अजित सिंह देशभर में लोकप्रिय हो गए.  

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कर्पूरी ठाकुर के अंत से हुई लालू की राजनीति की शुरुआत (Lalu’s political career began with the end of Karpoori Thakur)

बिहार में जननायक के नाम से जाने जाने वाले कर्पूरी ठाकर ने 1988 में दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन वह पिछड़ों की राजनीति को पूरी तरह से खाद-पानी देकर गए. कर्पूरी ठाकुर को पिछड़ों का नेता माना जाता था. उनके जाने से पिछड़ों की राजनीति करने वाले नेता का पद खाली हो गया. लालू प्रसाद यादव ने इस मौके का फायदा उठाया और अपने हित में मोड़ लिया. बेशक उस दौर में आम जनता तत्कालीन केंद्र सरकार और राज्य में स्थानीय सत्ता से निराश थी. जेपी आंदोलन चरम था. लालू यादव और नीतीश कुमार जेपी आंदोलन की ही उपज हैं और दोनों ही पिछड़ा वर्ग से आते हैं. 3 दशक से अधिक समय से पिछड़ों के रूप में लालू और नीतीश ही सत्ता के केंद्र में हैं.

इसका काफी हद तक श्रेय कर्पूर ठाकुर को जाता है, क्योंकि उन्होंने ही अपने प्रयासों से पिछड़ों की राजनीति को हवा दी. नीतीश और लालू ने एक साथ छात्र राजनीति की शुरुआत की. 3 दशक के दौरान नीतीश और लालू कभी साथ तो कभी दूर होते रहे. खैर, बिहार में जेपी आंदोलन के दौरान कांग्रेस को जेपी आंदोलन से ही चुनौती मिली. जेपी आंदोलन में सक्रिय हुए लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार दोनों ही बिहार के बड़े नेता बन गए. दोनों ही सीएम रहने के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री भी रहे.  बिहार से कांग्रेस की सत्ता का अंत 1989 में बिहार के भागलुपर में दंगों के बाद हुआ. वर्ष 1990 में लालू यादव जनता दल से बिहार के मुख्यमंत्री बने. इसके लिए लालू प्रसाद यादव ने कर्पूरी ठाकुर के साथ जेपी के नाम का भी सहारा लिया. 

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लालू प्रसाद यादव बने गरीबों के मसीहा (Lalu Prasad Yadav became the messiah of poor people)

1990 में लालू यादव जनता दल से बिहार के मुख्यमंत्री बने और यही से उनके राजनीतिक करियर में उभार आया. यह वही दौर था जब बिहार में अगड़ा और पिछड़ा की राजनीति चरम पर थी. कमडंल के ऊपर मंडल की राजनीति हावी हो गई थी. लालू यादव ने विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान एक जन सभा में कहा भी था ‘मैं आप लोगों को स्वर्ग में तो नहीं पहुंचा सकता लेकिन आवाज जरूर दूंगा.’ बिहार विधानसभा चुनाव 1995 में जातीय गणित काम कर गया. 1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बन गया. इसी दौरान लालू यादव को अल्पमत सरकार बनाने का मौका मिला था. लालू ने खुलकर जाति की राजनीति की. इसके बाद यानी 5 साल बाद बिहार विधानसभा चुनाव 1995 लालू यादव को गरीबों के मसीहा के रूप में पेश किया गया. इस चुनाव में नारा गढ़ा गया था- लालू यादव फकीर है, गरीबों की तकदीर है. विकास नहीं, सम्मान चाहिए. चुनाव परिणाम ने लालू प्रसाद यादव के कद को साफ कर दिया. लालू यादव ने पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई. बिहार विधानसभा चुनाव 1995 में जनता दल को 324 में से 167 सीटें मिलीं. इस चुनाव में लालू यादव का जातीय गणित हावी रहा. जनता दल के 167 विधायकों में से 63 यादव जाति से चुने गए थे. बात यहीं नहीं रुकी जनता दल के 55 जिला अध्यक्षों में से 21 यादव जाति से चुने गए थे. 

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चंद्रशेखर की मदद से बने मुख्यमंत्री (Lalu Became Chief Minister with the help of Chandrashekhar)

बिहार की राजधानी पटना में 8 मार्च, 1990 के दिन इतिहास रचा गया. पटना स्थित ब्रजकिशोर इसकी गवाही बना. यहां पर जनता दल की बैठक चल रही थी. इसमें बिहार के नए मुख्यमंत्री का चुनाव होना था. बिहार की 324 विधानसभा सीटों में से जनता दल को 122 सीटें मिली थीं. पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास और लालू प्रसाद यादव में से किसी एक का नाम मुख्यमंत्री के रूप में चुना जाना था. ‘गोपालगंज टू रायसीना माय पॉलिटिकल जर्नी’ पुस्तक में लिखा गया है कि लालू प्रसाद यादव ने चंद्रशेखर को फोन मिला दिया और कहा- ‘बाबू साहब, आपने कुछ नहीं किया तो वीपी सिंह का आदमी बिहार में सीएम की सीट पर बैठ जाएगा.’  चंद्रशेखर पहले से ही वीपी सिंह से खार खाए बैठे थे. 3 महीने पहले वीपी सिंह ने धोखा देकर प्रधानमंत्री पद की कुर्सी हथियाई थी. राजनीति में मौका ही असली होता है और चंद्रशेखर ने अपना ‘खेल’ खेल दिया.

चंद्रशेखर ने अपने करीबी रघुनाथ झा को फोन मिला दिया. यहां पर भी एक ट्विस्ट आ गया. रघुनाथ झा ने भी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी ठोक दी. वोटिंग प्रक्रिया में 127 विधायक शामिल हुए. रघुनाथ झा को 12, रामसुंदर दास तो 56, जबकि लालू प्रसाद यादव को 59 विधायकों का समर्थन मिला. इस तरह लालू यादव 1990 में विधायक से बिहार के मुख्यमंत्री बन गए. 42 साल की उम्र में वह बिहार के मुख्यमंत्री पद तक पहुंच गए. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के चयन में लालू प्रसाद यादव का साथ दिया था. कहा जाता है कि नीतीश कुमार जानते थे कि लाल प्रसाद जिस जाति (यादव) से आते हैं, उसका बिहार में 18 प्रतिशत से अधिक का जनाधार है, ऐसे में लालू का साथ देना मजबूरी भी था. 

मुसीबत देख बना ली नई राजनीति पार्टी (Lalu Yadav launches new political party)

लालू प्रसाद यादव के लिए राजनीति कभी आसान नहीं रही. मुख्यमंत्री पद भी बड़ी ही मुश्किल से मिला था. लालू यादव चारा घोटाले में फंस चुके थे. 23 जून, 1997 को चारा घोटाला मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (Central Bureau of Investigation) ने लालू यादव के अलावा कई अन्य आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी थी. ऐसे में मुख्यमंत्री लालू यादव पर गिरफ्तारी तय हो गई थी. इस्तीफा देने के लिए नैतिक दबाव बढ़ने लगा था. इसी बेचैनी में लालू ने आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, ज्योति बसु, शरद यादव के साथ कई अन्य नेताओं को फोन कर लालू ने सलाह ली. सभी ने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना होगा. इससे पहले 17 जून, 1997 को बिहार के तत्कालीन राज्यपाल एआर किदवई लालू यादव के खिलाफ CBI को चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति दे चुके थे.

शरद यादव और रामबिलास पासवास जैसे करीबी नेताओं ने भी लालू यादव के इस्तीफे की मांग कर दी थी. लालू प्रसाद यादव के सामने मुसीबत दोहरी थी, क्योंकि जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद का चुनाव भी करीब था. लालू यह बखूबी जानते थे कि सीएम पद के साथ राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष का पद भी ना चला जाए. चारा घोटाले में गिरफ्तारी और जेल जाने के कयासों के बीच 5 जुलाई, 1997 को लालू यादव ने नए राजनीतिक दल का एलान कर दिया. राष्ट्रीय जनता दल नाम रखा और खुद अध्यक्ष बन गए. इससे पहले जनता दल के अध्यक्ष पद के लिए शरद यादव प्रतिद्वंद्वी लालू यादव को चुनौती दे चुके थे. लालू ने इसीलिए नए राजनीतिक दल की चाल चली. जनता दल में कुल 22 सांसद थे. नए राजनीतिक दल राष्ट्रीय जनता दल के साथ 16 सांसद भी लालू ले आए. 

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जेल जाने से पहले राबड़ी को बनवाया सीएम (Lalu made Rabri the CM before going to jail)

24 जुलाई, 1997 को पटना हाई कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी थी. ऐसे में चारा घोटाले में जेल जाना तय था, लेकिन लालू प्रसाद यादव ने अपना धैर्य नहीं खोया.  25 जुलाई, 1997 का दिन बिहार की राजनीति में अहम था, क्योंकि लालू का इस्तीफा देना तय था. समर्थक चिंतित और विरोधी खुश थे. लालू को डर था कि कहीं राज्य में राष्ट्रपति शासन ना लगा दिया जाए. बताया जाता है कि राष्ट्रपति शासन लगने की आहट के बीच सुरक्षा बलों के जवानों ने मुख्यमंत्री आवास को घेरना शुरू कर दिया था. लालू प्रसाद यादव के सामने सत्ता बचाने की चुनौती थी. वह इस्तीफा देते तो जाबिर हुसैन, रघुवंश प्रसाद सिंह और जगदानंद सिंह जैसे नेता मुख्यमंत्री की रेस में थे. रंजन यादव का नाम भी मुख्यमंत्री की रेस में था जो लालू यादव के परिवार के करीबियों में शुमार थे. लालू यादव के लिए 24 जुलाई, 1997 की रात बहुत भारी थी.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 24 जुलाई की रात करीब 10 बजे लालू ने पत्नी राबड़ी देवी को बुलाया और कहा’ कल तुम्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी है.’ इसका दूसरा मतलब यह है कि वह जेल जाएंगे, इस पर परिवार का माहौल गमगीन हो गया. कहा जाता है कि लालू प्रसाद के यह कहते ही पत्नी राबड़ी देवी फूट-फूट कर रोने लगीं. बच्चे भी घबराकर सुबकने लगे. लालू ने राबड़ी को हिम्मत बंधाई और कमरे से निकलकर ड्राइंग रूम में आ गए. इसके बाद लालू ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी को फोन किया और कहा- हम राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने जा रहे हैं. इसकी एवज में जो चाहिए हो जाएगा. अगले दिन ठीक यही हुआ. राबड़ी देवी ने हिचकते, डरते और गलतियां करते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह जानकारी बहुत कम लोगों को पता होगी कि लालू ने उस समय के सभी 29 कांग्रेस विधायकों का मंत्री बना दिया था.

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कितना बड़ा है लालू यादव का कुनबा? (Lalu Yadav family)

बेशक लालू प्रसाद यादव परिवारवाद का उदाहरण हैं. लालू यादव के कुनबे में 20 लोग हैं, जिनमें 8 लोग सक्रिय राजनीति में हैं. लालू खुद राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जबकि दोनों बेटे तेज प्रताद यादव और तेजस्वी यादव विधायक हैं. तेजस्वी यादव तो बिहार के उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. बेटी मीसी राज्यसभा के बाद अब लोकसभा से सांसद हैं. राबड़ी देवी एक नहीं तीन बार बिहार की CM रह चुकी हैं. लालू यादव के साथ सत्ता में रहने के दौरान राबड़ी देवी के दोनों भाई सुभाष यादव और साधु यादव भी सक्रिय रहे और सत्ता की मलाई का स्वाद लेते रहे. साधु और सुभाष के बेटों-बेटियों ने भी लालू यादव का नाम लेकर राजनीति में एंट्री पाने की कोशिश की. कुछ महीने पहले लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की गर्लफ्रेंड के साथ रिश्ते की जानकारी सार्वजनिक हुई तो बिहार के पूर्व सीएम असहज हो गए. इसके उन्होंने तत्काल तेज प्रताप यादव को राष्ट्रीय जनता दल और परिवार से छह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया.

लालू यादव के कुनबे की बात करें तो उनके सबसे बड़े भाई का नाम मंगरु यादव है, जिनका परिवार आज भी फुलवरिया गांव में रहता है. लालू यादव के दूसरे भाई गुलाब यादव अब दुनिया में नहीं है, वह दूसरे नंबर के भाई थे. तीसरे भाई मुकुंद यादव भी दुनिया को अलविदा कह चुके हैं. लालू यादव की इकलौती बहन गंगोत्री देवी थीं, जिनका 2018 में हार्ट अटैक से निधन हो गया .लालू परिवार में सबसे छोटे भाई शुकदेव यादव हैं, जो आज भी जीवित हैं. लालू यादव के परिवार की बात करें तो लालू और राबड़ी देवी के 9 बच्चे हैं. मीसा भारती राज्यसभा सांसद हैं. रोहिणी आचार्य 2024 में सारण से लोकसभा चुनाव लड़ीं लेकिन हार गईं.   चंदा यादव की शादी विक्रम सिंह से हुई है. बेटी रागिनी यादव की शादी समाजवादी पार्टी के नेता राहुल यादव से हुई हैं. एक अन्य बेटी हेमा यादव की शादी दिल्ली के कारोबारी विनीत यादव से हुई. छठी बेटी अनुष्का यादव की शादी हरियाणा के पूर्व विधायक चिरंजीव राव से उनकी शादी हुई है. सातवीं बेटी राजलक्ष्मी यादव का विवाह यूपी के पूर्व सांसद तेज प्रताप सिंह यादव से हुआ है. बेटों के बात करें तो तेज प्रताप यादव मंत्री रह चुके हैं, लेकिन वह पार्टी से बाहर कर दिए गए हैं. दूसरे बेटे तेजस्वी यादव बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राजद के प्रमुख नेता हैं.

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