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गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की होड़ क्यों? जानिए सोने की कीमतों का आगे क्या होगा

Will Gold Price Increase: हाल के सालों में सोना सिर्फ़ एक कीमती धातु नहीं रह गया है. यह ग्लोबल पॉलिटिक्स, युद्ध और आर्थिक अनिश्चितता का सबसे भरोसेमंद इंडिकेटर बनकर उभरा है. दुनिया भर में इन्वेस्टर्स से लेकर सेंट्रल बैंकों तक हर कोई अब सोने को एक सुरक्षित ठिकाना मान रहा है.

By: Mohammad Nematullah | Published: January 23, 2026 11:13:18 PM IST



Will Gold Price Increase: हाल के सालों में सोना सिर्फ़ एक कीमती धातु नहीं रह गया है. यह ग्लोबल पॉलिटिक्स, युद्ध और आर्थिक अनिश्चितता का सबसे भरोसेमंद इंडिकेटर बनकर उभरा है. दुनिया भर में इन्वेस्टर्स से लेकर सेंट्रल बैंकों तक हर कोई अब सोने को एक सुरक्षित ठिकाना मान रहा है. भारत इसका एक बड़ा उदाहरण है, जहां हमारा सोने का रिजर्व जो 2020 में 661 टन था, 2025 तक बढ़कर 879 टन हो गया, यह सिर्फ़ भारत की बात नहीं है. दुनिया भर के कई देश अपने रिज़र्व में सोने का हिस्सा तेज़ी से बढ़ा रहे है. पिछले पांच सालों के ट्रेंड को देखें तो सोने ने काफ़ी ज़्यादा रिटर्न दिया है.
इसने इसे स्टॉक मार्केट और दूसरी एसेट क्लास से अलग कर दिया है. अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? जब भी दुनिया में युद्ध और अस्थिरता का माहौल होता है, तो सोने की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर क्यों पहुंच जाती हैं? क्या यह सिर्फ़ एक पारंपरिक मान्यता है, या इसके पीछे गहरे ऐतिहासिक और राजनीतिक कारण हैं? क्या भविष्य में सोने की कीमतें बढ़ती रहेंगी, या यह उछाल सिर्फ़ अस्थायी है? आइए इन सभी बातों को विस्तार से जानें…

सेंट्रल बैंक बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहे

  • सोने की कीमतों में रिकॉर्ड उछाल का एक बड़ा कारण सेंट्रल बैंकों की खरीदारी है.
  • 2022 और 2024 के बीच, दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों ने लगभग 3200 टन सोना खरीदा, जिसमें रूस, चीन, भारत और तुर्की जैसे देश इस लिस्ट में सबसे आगे हैं.
  • ये देश धीरे-धीरे अपने फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व में अमेरिकी डॉलर का हिस्सा कम कर रहे हैं और इसकी जगह सोने को प्राथमिकता दे रहे है.
  • यह साफ़ तौर पर दिखाता है कि सोने की डिमांड सिर्फ़ आम लोगों के बीच नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर की सरकारों की स्ट्रैटेजी का भी एक अहम हिस्सा है.

अनिश्चितता के समय सोना क्यों खरीदा जाता है?

  • जब भी दुनिया ने युद्ध या किसी बड़े संकट का सामना किया है, तो सोने की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है.
  • 1970 के दशक में, ईरानी क्रांति, सोवियत संघ के अफ़गानिस्तान पर हमले और योम किप्पुर युद्ध के दौरान, सोने और तेल दोनों की कीमतें तेज़ी से बढ़ी.
  • इसी तरह चाहे वह 2008 का लेहमैन ब्रदर्स का फाइनेंशियल संकट हो या 2022 का रूस-यूक्रेन युद्ध, हर बड़ी अस्थिरता वाली घटना के बाद इन्वेस्टर्स ने सोने की ओर रुख करना पसंद किया है.
  • अनिश्चितता के समय, लोग ऐसी एसेट चाहते हैं जो अपनी वैल्यू बनाए रखें, और सोना ऐसी ही एक एसेट है.

 ब्रेटन वुड्स और सोने की कहानी

  • युद्ध और अस्थिरता का सोने से गहरा संबंध है। यह संबंध 1944 के ब्रेटन वुड्स समझौते से जुड़ा है..
  • दूसरे विश्व युद्ध के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका के पास दुनिया के सोने के भंडार का लगभग 66 प्रतिशत हिस्सा था.
  • इसी ताकत के दम पर डॉलर को दुनिया की रिज़र्व करेंसी बनाया गया, और हर डॉलर को सोने की गारंटी से जोड़ा गया.
  • इस सिस्टम ने डॉलर पर दुनिया भर में भरोसा कायम किया.
  • लंबे समय तक, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार डॉलर और सोने से जुड़ा रहा.

निक्सन शॉक

  • 1971 में ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में एक बड़ा बदलाव आया.
  • उस समय के अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को सोने से अलग कर दिया, जिसे निक्सन शॉक के नाम से जाना जाता है.
  • इस फैसले से अमेरिका को जितना चाहे उतना पैसा छापने की आज़ादी मिल गई.
  • नतीजतन, कई देशों का डॉलर पर से भरोसा कम होने लगा.
  • इस दौरान, 1971 से 1980 तक, सोने की कीमत $38 प्रति औंस से बढ़कर लगभग $636 प्रति औंस हो गई.
  • सिर्फ नौ सालों में यह भारी बढ़ोतरी दिखाती है कि सोने को सुरक्षित निवेश क्यों माना जाता है.
  • सोने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अर्थव्यवस्था गिरने पर भी इसकी कीमत कम नहीं होती.
  • इसीलिए इसे सेफ हेवन कहा जाता है.
  • खाड़ी युद्ध, इराक संकट, 9/11 हमले और 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल संकट जैसे बड़े अस्थिरता के समय में, निवेशकों ने सोने को प्राथमिकता दी.

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