Afternoon sleep: दोपहर के समय अक्सर लोगों को नींद और सुस्ती आती है. काम के बीच अचानक आने वाली यह थकान या जम्हाई केवल आलस्य नहीं बल्कि हमारे शरीर की जैविक प्रक्रिया का हिस्सा है. डॉक्टर्स के अनुसार दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच मस्तिष्क और शरीर में कई बदलाव होते हैं, जो नींद को प्रेरित करते हैं.
क्यों आती है दोपहर में सुस्ती
सबसे पहले, इसे समझने के लिए हमें सर्केडियन रिदम की बात करनी होगी. यह हमारी जैविक घड़ी है, जो नींद, जागने, भूख और अन्य शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित करती है. दिन में यह रिदम कुछ समय के लिए शरीर को आराम की ओर मोड़ता है. यही कारण है कि दोपहर के समय नींद अधिक आती है. विज्ञानी बताते हैं कि दोपहर के समय शरीर में कोरटिसोल हार्मोन का स्तर घटता है. कोरटिसोल ऊर्जा बनाए रखने में मदद करता है. जब इसका स्तर कम होता है, तो शरीर और मस्तिष्क में ऊर्जा की कमी महसूस होने लगती है. इसके साथ ही, मस्तिष्क में नींद बढ़ाने वाले मेलाटोनिन का स्तर थोड़े समय के लिए बढ़ सकता है. मेलाटोनिन नींद के लिए जिम्मेदार हार्मोन है. यही कारण है कि इस दौरान लोग अधिक जम्हाई लेते हैं और हल्की नींद महसूस करते हैं.
यह है सबसे बड़ा कारण
दोपहर के भोजन का भी इसमें बड़ा हाथ होता है. भारी भोजन खाने पर पाचन प्रक्रिया सक्रिय हो जाती है. शरीर का अधिकांश रक्त पाचन तंत्र की ओर प्रवाहित होता है और मस्तिष्क तक रक्त कम पहुंचता है. इससे भी थकान और सुस्ती बढ़ती है. विशेषकर यदि भोजन में कार्बोहाइड्रेट और तेल ज्यादा हों, तो नींद की प्रवृत्ति और अधिक बढ़ जाती है.
क्या जरूरी है दोपहर को सोना
हालांकि, विशेषज्ञ बताते हैं कि दोपहर की थोड़ी सी नींद या शॉर्ट नैप (15-20 मिनट) लेने से यह सुस्ती कम हो सकती है. हल्की झपकी लेने से मस्तिष्क की सक्रियता बढ़ती है, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता सुधरती है और दोपहर के बाद का काम आसान हो जाता है. इसके अलावा, हल्का व्यायाम, पर्याप्त पानी पीना और संतुलित भोजन भी दोपहर की सुस्ती को नियंत्रित करने में मदद करता है.
क्या सामान्य बात है दोपहर को नींद आना
कुछ लोग इस समय कैफीन या कॉफी का सहारा लेते हैं. हालांकि, डॉक्टर्स का कहना है कि बहुत ज्यादा कैफीन लेने से नींद चक्र प्रभावित हो सकता है और रात की नींद में समस्या पैदा हो सकती है. इसलिए दोपहर में हल्की नैप या ताजगी बढ़ाने वाले उपाय ज्यादा कारगर माने जाते हैं. दोपहर में नींद और सुस्ती पूरी तरह से सामान्य है और इसे शारीरिक कमजोरी या आलस्य के रूप में देखने की जरूरत नहीं है. यह हमारी जैविक घड़ी, हार्मोनिक बदलाव और पाचन क्रिया का एक प्राकृतिक हिस्सा है. इसे समझकर और सही उपाय अपनाकर हम अपनी उत्पादकता और ऊर्जा को दोपहर में भी बनाए रख सकते हैं.