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Risks of Sleeping After Midnight: आधी रात के बाद सोना क्यों पड़ सकता है भारी? 8 घंटे की नींद भी नहीं बचा पाती नुकसान से

सिर्फ 7–8 घंटे की नींद लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही समय पर सोना भी उतना ही जरूरी है. विशेषज्ञों के अनुसार आधी रात के बाद सोने की आदत शरीर की जैविक घड़ी (सर्कैडियन रिद्म) को प्रभावित करती है.

By: Ranjana Sharma | Published: February 12, 2026 11:14:05 AM IST



Risks of sleeping after midnight: अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि अगर वे रोज 7–8 घंटे की नींद ले रहे हैं तो उनका स्वास्थ्य सुरक्षित है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ नींद की अवधि ही नहीं, बल्कि उसका समय भी उतना ही महत्वपूर्ण है. यानी आप कब सोते हैं, यह आपके शरीर पर गहरा असर डालता है. आधी रात के बाद सोने की आदत, भले ही आप पूरी नींद ले लें, लंबे समय में सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है.

ऐसे बिगड़ जाता है हार्मोन संतुलन

दरअसल, हमारे शरीर की अपनी एक जैविक घड़ी होती है, जिसे सर्कैडियन रिद्म कहा जाता है. यह घड़ी दिन-रात के प्राकृतिक चक्र के अनुसार काम करती है. सूरज ढलने के बाद शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव बढ़ता है, जो नींद लाने में मदद करता है. अगर हम देर रात तक जागते रहते हैं मोबाइल, लैपटॉप या टीवी की रोशनी में तो यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है. इससे हार्मोन संतुलन बिगड़ सकता है.

रात 10 से 2 बजे के बीच का समय शरीर के लिए बेहद महत्वपूर्ण 

विशेषज्ञ बताते हैं कि रात 10 बजे से 2 बजे के बीच का समय शरीर के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है. इसी दौरान लिवर यानी यकृत शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को सक्रिय रूप से अंजाम देता है. अगर इस समय आप गहरी नींद में नहीं हैं, तो यह डिटॉक्स प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. लंबे समय तक ऐसा होने पर फैटी लिवर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. सिर्फ लिवर ही नहीं, देर से सोने का असर मेटाबॉलिज्म पर भी पड़ता है. रिसर्च में पाया गया है कि जो लोग नियमित रूप से आधी रात के बाद सोते हैं, उनमें वजन बढ़ने, इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम ज्यादा देखा गया है. इसकी वजह यह है कि शरीर की ऊर्जा खर्च करने और वसा जलाने की क्षमता भी जैविक घड़ी से जुड़ी होती है. जब नींद का समय गड़बड़ा जाता है, तो फैट बर्निंग की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है.

रात 2 बजे सोने वालों को हो सकते हैं ये नुकसान

मांसपेशियों के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी गहरी नींद के दौरान ही बेहतर ढंग से होती है. ग्रोथ हार्मोन का स्राव मुख्य रूप से शुरुआती नींद के घंटों में होता है. यदि आप रात 1 या 2 बजे सोते हैं, तो इस प्राकृतिक हार्मोनल चक्र में व्यवधान आ सकता है. इससे थकान, मांसपेशियों में दर्द और रिकवरी में देरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं. डॉक्टरों का कहना है कि “अर्ली टू बेड” यानी आधी रात से पहले सोने की आदत कई मायनों में फायदेमंद है. इससे हार्मोन संतुलन बेहतर रहता है, पाचन क्रिया सुधरती है, मानसिक तनाव कम होता है और हृदय स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर पड़ता है. सुबह जल्दी उठने से शरीर को प्राकृतिक रोशनी मिलती है, जो सर्कैडियन रिद्म को संतुलित रखने में मदद करती है.

सोने से एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बना लें

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रात 10 से 11 बजे के बीच बिस्तर पर जाने की कोशिश करें. सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बना लें और हल्का भोजन करें. नियमित समय पर सोना और जागना शरीर को स्थिर लय देता है. स्पष्ट है कि सिर्फ 8 घंटे की नींद पर्याप्त नहीं, बल्कि सही समय पर ली गई नींद ही असली मायनों में स्वास्थ्य का आधार है. अपनी दिनचर्या में छोटा-सा बदलाव कर आप लंबे समय तक गंभीर बीमारियों से बचाव कर सकते हैं.

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