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Republic Day Parade: राष्ट्रपति से पहले किसे और क्यों सलामी देती है सिख रेजिमेंट, जानें डबल सैल्यूट परंपरा की इनसाइड स्टोरी

Sikh Regiments Unique Tradition: कर्तव्य पथ पर परेड में मार्च करने के दौरान हर सैन्य टुकड़ी राष्ट्रपति को सलामी देती है. सिख रेजिमेंट की एक विशेष परंपरा है, जो 1979 में शुरू हुई थी.

By: JP Yadav | Published: January 26, 2026 12:41:30 PM IST



Sikh Regiments Unique Tradition: देशभर में सोमवार (26 जनवरी, 2026) को 77वां गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है. हर साल की तरह इस बार भी कर्तव्य पथ पर परेड के दौरान देश की सैन्य शक्ति, सांस्कृतिक विविधता और लोकतांत्रिक परंपराओं को पेश किया गया. खास बात यह रही कि इस बार राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने को स्मरण भी किया गया. इस साल भी सिख रेजिमेंट की अनोखी सलामी ने समारोह को ऐतिहासिक और भावनात्मक बना दिया. इस स्टोरी में हम बताएंगे कि सिख रेजिमेंट की अनोखी सलामी के बारे में. 

सिख रेजिमेंट को हमेशा से बहादुरी के लिए जाना जाता रहा है. कई युद्धों में सिख रेजिमेंट ने अपनी बहादुरी से लोगों का दिल जीता. गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान सिख रेजिमेंट की सलामी परंपरा अपनी वीरता और धार्मिक निष्ठा का अनूठा मिश्रण है. यह अनूठी परंपरा वर्ष 1979 से चली आ रही है. प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस परेड के दौरान रेजिमेंट दोहरी सलामी देती है. इसके तहत पहली सलामी राष्ट्रपति को दी जाती है, जबकि  दूसरी सलामी नई दिल्ली स्थित सिस गंज गुरुद्वारा साहिब के प्रति सम्मान के रूप में दी जाती है. इस परंपरा की शुरुआत वर्ष  1979 में हुई, इसके बाद हर साल इस परंपरा का पालन होता है. 

क्या है परंपरा?

26 जनवरी के दिन गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान परेड में भारतीय सेना की टुकड़ियां एक बार सलामी देती हैं. वहीं, सिख रेजिमेंट कर्तव्य पथ से मार्च करते हुए चांदनी चौक के सिस गंज गुरुद्वारा साहिब के सामने अपनी तलवार नीचे कर दाईं ओर सम्मान प्रकट करती है. इस परंपरा की शुरुआत के बारे में कहा जाता है कि यह वर्ष 1979 में हुआ. दरअसल, गणतंत्र दिवस परेड की रिहर्सल के दौरान 24 जनवरी 1979 को ब्रिगेडियर इंजो गखल के नेतृत्व में सिखों ने सिस गंज गुरुद्वारा साहिब की ओर झुककर सलामी दी. इस दौरान गुरुद्वारा प्रबंधन ने वीर सैनिकों पर फूलों की पंखुड़ियां बरसाकर स्वागत किया. यह सब सिख रेजिमेंट का पारंपरिक अभिवादन सत श्री अकाल है. यह उनकी वीरता और विश्वास को दर्शाता है

क्या है इसका भावनात्मक संबंध

यह सिर्फ एक जज्बा नहीं, बल्कि यह परंपरा सिखों के सेवा के सिद्धांत का पालन करना का संदेश है. यह दर्शाता है कि राष्ट्र के प्रति कर्तव्य और गुरु के प्रति श्रद्धा किस उच्च प्रतिमान पर होती है. इसके साथ ही यह परंपरा 9वें गुरु को समर्पित है. जब गुरुतेग बहादुर का शीश वर्ष 1675 में औरंगजेब के आदेश पर चांदनी चौक में धड़ से अगल कर दिया गया था. कुछ सालों बाद गुरुद्वारा शीश गंज साहिब बनाया गया. 

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