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न IIT, न NIT…एक देरी से फंसी ट्रेन ने दिया ‘Where Is My Train’ का आइडिया; यहां जानें अहमद निज़ाम मोहईदीन की कहानी सक्सेस स्टोरी

Where Is My Train: अहमद ने तकनीकी प्रयोगों, असंख्य कोड लाइनों और सैकड़ों ट्रायल-एरर के बाद “Where Is My Train” ऐप की आधारशिला रखी.

By: Shubahm Srivastava | Published: January 10, 2026 10:54:37 PM IST



Ahmed Nizam Mohaideen Story: अहमद निज़ाम मोहईदीन की कहानी एक साधारण भारतीय यात्री की रोज़मर्रा की परेशानी से शुरू होती है—ट्रेन की अनिश्चितता. न कोई स्पष्ट टाइमलाइन, न सही लोकेशन अपडेट, और न ही यह सच में अंदाज़ा कि ट्रेन कब प्लेटफ़ॉर्म पर आएगी. यही निराशा धीरे-धीरे एक बड़े आइडिया में बदली, जिसने बाद में भारत के करोड़ों यात्रियों के सफ़र को हमेशा के लिए बदल दिया. अहमद एक IIT या NIT ग्रेजुएट नहीं थे, लेकिन तकनीक की समझ, जिज्ञासा और समस्या हल करने की प्रवृत्ति ने उन्हें भीड़ से अलग खड़ा किया.

अहमद को ऐसे आया ‘Where Is My Train’ का ख्याल

दक्षिण भारत के एक साधारण परिवार से आने वाले अहमद ने अपनी पढ़ाई और करियर ऐसे माहौल में बनाया, जहाँ सफलता की परिभाषा अक्सर प्रतिष्ठित कॉलेजों से जुड़ी होती है. लेकिन उनके लिए असली शिक्षा रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर मिली—वह इंतज़ार, असहायता और भ्रम जो हर रोज़ लाखों यात्री महसूस करते हैं. एक लंबी और देरी से चलने वाली ट्रेन यात्रा के दौरान, उन्हें अचानक एहसास हुआ कि ट्रेन की ट्रैकिंग को बेहतर किया जा सकता है, और यह समझ एक विचार नहीं, बल्कि एक मिशन बनी.

इंटरनेट या GPS न होने पर भी ऐप करता है काम, जानें कैसे?

अहमद ने तकनीकी प्रयोगों, असंख्य कोड लाइनों और सैकड़ों ट्रायल-एरर के बाद “Where Is My Train” ऐप की आधारशिला रखी. उन्होंने GPS या इंटरनेट पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय भारत में उपलब्ध लो-टेक नेटवर्क—मोबाइल सिग्नल और सेल टॉवर मैपिंग—का नया इस्तेमाल सोचा. यही ऐप की असली ताकत बनी. Where Is My Train ऐप इंटरनेट या GPS न होने पर भी ट्रेन की लोकेशन का अनुमान लगा लेता था. यह उन इलाकों में काम करता था जहाँ नेटवर्क मुश्किल से पहुंचता था—छोटे शहर, गाँव, और रेलवे के बीच के लंबे रूट.

न हाई-प्रोफाइल मार्केटिंग, न करोड़ों का निवेश

लॉन्च के बाद ऐप रातों-रात सफल नहीं हुआ, लेकिन धीरे-धीरे ट्रेन यात्रियों की असली जरूरत बन गया. लाखों डाउनलोड, उत्कृष्ट रेटिंग और मुंह-जबानी प्रचार ने इसे लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुंचा दिया. खास बात यह थी कि अहमद ने न कभी हाई-प्रोफाइल मार्केटिंग अभियान चलाया, न ही करोड़ों रुपये का निवेश. यह एक भारतीय समस्या का भारतीय समाधान था—बिना शोर, बिना दिखावे—और सबसे ज़रूरी, बिना डेटा खर्च किए.

वैश्विक स्तर पर पहुंचा अहमद का ऐप

ऐप की सफलता ने टेक दुनिया का ध्यान खींचा. 2018 में, गूगल ने Where Is My Train को अधिग्रहित कर लिया और अहमद की मेहनत वैश्विक स्तर पर मान्यता पाई. यह लेन-देन न केवल उनके स्टार्टअप के लिए ऐतिहासिक पल था बल्कि यह साबित करने वाला उदाहरण भी कि नवाचार IIT की प्रयोगशालाओं से ही नहीं, रेलवे स्टेशन की देरी से भी जन्म ले सकता है.

अहमद की कहानी उस सच्चाई की याद दिलाती है कि भारत जैसे देश में सबसे बड़े विचार रोज़मर्रा की तकलीफों से पैदा होते हैं. और अगर दृष्टि स्पष्ट हो, तो डिग्री नहीं, दृढ़ता सफलता तय करती है.

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