Ambubachi Mela: असम में कामाख्या मंदिर में हर साल अंबुबाची मेला लगता है. यह मेला देवी कामाख्या के मासिक धर्म का अनोखे तरीके से जश्न मनाने के लिए लगाया जाता है. इसे प्रजनन क्षमता और रचनात्मक शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है. भक्त अनुष्ठानों, सांस्कृतिक उत्सवों और सामुदायिक समारोहों को देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं. भारत के अन्य हिस्सों में मासिक धर्म गंदा माना जाता है, लेकिन यहां इसी मासिक धर्म के लिए एक भव्य मेला और पूजन का आयोजन किया जाता है.
क्यों लगता है अंबुबाची मेला?
अंबुबाची मेला भारत में साल के सबसे ज्यादा इंतजार किए जाने वाले समय में से एक है. पूरा देश असम में कामाख्या देवी का आशीर्वाद लेने के लिए इस अनोखे त्योहार के शुरू होने का इंतजार करता है. यह जीवंत सालाना हिंदू त्योहार हर साल असम के कामाख्या मंदिर में मनाया जाता है और देवी कामाख्या के मासिक धर्म का जश्न मनाता है, जो प्रजनन और सृजन का प्रतीक है. यह पूरा त्योहार महिलाओं में एक जरूरी प्राकृतिक प्रक्रिया ‘मासिक धर्म’ के इर्द-गिर्द घूमता है. यह प्राकृतिक घटना भारत के कई हिस्सों में अभी भी कलंक और पाबंदियों से घिरी हुई है, लेकिन एक ऐसा क्षेत्र है जो पूजा के साथ इस चलन को सबसे मजबूत तरीके से चुनौती देता है.
मासिक धर्म पर्व
असम में, मासिक धर्म को त्यागा नहीं जाता – इसे मनाया और पूजा जाता है. यह अनोखा नजरिया अंबुबाची मेले में दिखता है, जो गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में हर साल मनाया जाता है. यहां, एक महिला के शरीर के प्राकृतिक चक्र को दिव्य माना जाता है, जो दुनिया के दूसरे हिस्सों में अक्सर होने वाली चुप्पी और कलंक के बिल्कुल विपरीत है. असम के गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या मंदिर दिव्य स्त्री शक्ति और आध्यात्मिक शक्ति का एक भव्य प्रतीक है. 51 शक्ति पीठों में से एक, यह पवित्र स्थान दुनिया भर से लाखों भक्तों को आकर्षित करता है. इसका सबसे महत्वपूर्ण त्योहार अंबुबाची मेला है, जो एक प्राचीन और अनोखा त्योहार है जो देवी कामाख्या के मासिक धर्म का उत्सव मनाता है. क्या है इस मेले का मतलब?
क्या है अंबुबाची मेले का सही मतलब?
“अंबुबाची” का मतलब है “पानी से बात करना,” जो मानसून और देवी के मासिक धर्म दोनों को दर्शाता है. यह त्योहार देवी कामाख्या के सालाना मासिक धर्म चक्र का जश्न मनाता है. इसकी जड़ें तांत्रिक पौराणिक कथाओं और परंपरा में हैं, जो पृथ्वी की उर्वरता और रचनात्मक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है. किंवदंती है कि शिव के तांडव नृत्य के दौरान देवी सती की योनि (गर्भ) यहीं गिरी थी. यह त्योहार उर्वरता, पुनर्जन्म और प्रकृति की रक्षा करने वाली शक्तियों का सम्मान करता है. ऐतिहासिक रूप से, यह वह समय भी था जब कृषि गतिविधियां रुक जाती थीं. अंबुबाची सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है; यह एक प्राकृतिक जैविक घटना की पहचान है. देवी के मासिक धर्म को सृजन, देखभाल और परिवर्तन का संकेत माना गया है. इस दौरान दिव्य शक्ति मंदिर के अंदर केंद्रित मानी जाती है.
पर्व का महाकुंभ
असम में, पीरियड्स को लेकर सोच भारत के ज़्यादातर हिस्सों की तुलना में ज़्यादा उदार है, जहां वर्जनाओं के कारण रोक और शर्मिंदगी होती है. त्योहार में “रक्त बस्तर” (देवी के खून) का उत्सव मनाना, स्त्री शक्ति के प्रति सम्मान की त्योहार की थीम को दिखाता है. महिलाओं और पुरुषों दोनों को उत्सव में आने और भाग लेने की अनुमति है, जो स्त्री शक्ति और आध्यात्मिक जागृति की सार्वभौमिक प्रकृति की याद दिलाता है. यह सदियों पुरानी प्रथा, जिसे अब “पूर्व का महाकुंभ” भी कहा जाता है, सभी को जन्म, पुनर्जन्म और प्राकृतिक अस्तित्व की पवित्रता के चक्र पर विचार करने के लिए आमंत्रित करती है.
कामाख्या मंदिर के पीछे का इतिहास
गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ियों पर स्थित कामाख्या मंदिर, 51 शक्तिपीठों में से एक है, जो शक्ति उपासकों का स्थान है, और हर शक्तिपीठ भगवान शिव की साथी सती के शरीर के एक अंग का प्रतिनिधित्व करता है. मंदिर के गर्भगृह में योनि – महिला जननांग है, जिसे एक चट्टान से दर्शाया गया है. किंवदंतियों के अनुसार, नीलाचल पहाड़ियों के ऊपर यह मंदिर, जिसका उत्तरी भाग ब्रह्मपुत्र नदी की ओर ढलान पर है, राक्षस राजा नरकासुर ने बनवाया था. लेकिन रिकॉर्ड केवल 1565 से उपलब्ध हैं, जब कोच राजा नरनारायण ने 1565 में मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था. मध्ययुगीन कोच राजघराने के वंशज इस मंदिर में जाने से बचते हैं क्योंकि माना जाता है कि देवी ने राजा और उनके भाई चिलाराय जो असम के पूजनीय सेनापतियों में से एक थे द्वारा चुपके से उनका नृत्य देखने के बाद राजघराने को श्राप दिया था. गुवाहाटी स्थित सेंटर फॉर कोच-राजबोंगशी स्टडीज एंड डेवलपमेंट के शोधकर्ताओं ने कहा कि ऐसी किंवदंतियां हैं कि जब नरनारायण के शासनकाल के एक पुजारी केंडुकोली ने अपनी आंखें बंद करके पूजा की थी, तब देवी ने नृत्य किया था.
ब्रह्मपुत्र का पानी हो जाता है लाल
देवी कामाख्या के रजस्वला होने का असर सिर्फ मंदिर ही नहीं बल्कि प्रकृति पर भी नजरआता है. देवी के अम्बुबाची होने से कामाख्या मंदिर के पास बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी भी 3 दिनों के लिए लाल हो जाता है.