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आखिर भैंस किसकी? दो दावेदार आमने-सामने, फिर पुलिस ने ऐसे सुलझाया पूरा मामला

Kota Police Buffalo Case: यहां दो पक्षों के बीच भैंस और उसके बच्चे को लेकर कहासुनी शुरू हुई, जो देखते ही देखते विवाद में बदल गई.

By: Shubahm Srivastava | Published: January 4, 2026 11:56:38 PM IST



Kota Buffalo Ownership Dispute: राजस्थान के कोटा जिले में पुलिस के सामने एक अनोखा और दिलचस्प मामला सामने आया, जिसने कुछ देर के लिए थाने को भी असमंजस में डाल दिया. यह मामला किसी चोरी, मारपीट या आपराधिक घटना का नहीं था, बल्कि एक भैंस और उसके पाड़े की असली मिल्कियत को लेकर दो लोगों के बीच हुए विवाद का था. विवाद इतना बढ़ गया कि पुलिस को सच्चाई जानने के लिए भैंस का मेडिकल टेस्ट कराना पड़ा.

भैंस और उसके बच्चे को लेकर दो पक्ष आमने-सामने

यह घटना शनिवार दोपहर को कोटा के कुन्हाड़ी थाना क्षेत्र की है. यहां दो पक्षों के बीच भैंस और उसके बच्चे को लेकर कहासुनी शुरू हुई, जो देखते ही देखते विवाद में बदल गई. दोनों ही पक्ष भैंस को अपनी बताते हुए एक-दूसरे पर झूठा दावा करने का आरोप लगाने लगे. जब आपसी सहमति से मामला नहीं सुलझा, तो दोनों पक्ष भैंस और पाड़े को लेकर सीधे थाने पहुंच गए.

पुलिस के सामने खड़ी हुई चुनौती

थाने में पहुंचते ही पुलिस के सामने चुनौती खड़ी हो गई कि आखिर भैंस का असली मालिक कौन है. स्थिति को संभालते हुए थाना अधिकारी कौशल्या गालव ने भैंस और उसके बच्चे को पुलिस वाहन से थाने मंगवाया. करीब चार घंटे तक थाने के बाहर भीड़ जमा रही और पुलिस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए विकल्प तलाशती रही.

विवाद सुलझाने के लिए पुलिस ने दोनों दावेदारों से भैंस की उम्र पूछी. यहीं से मामला निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ा। बालिता रोड निवासी इंद्रजीत केवट ने दावा किया कि भैंस उसकी है और उसकी उम्र करीब 7 साल है. वहीं दूसरे पक्ष के रामलाल मेघवाल ने भैंस को अपनी बताते हुए उसकी उम्र साढ़े चार साल बताई.

ऐसे सामने आई सच्चाई

सच्चाई सामने लाने के लिए पुलिस ने पशु चिकित्सकों की टीम बुलाकर भैंस का मेडिकल परीक्षण करवाया. डॉक्टरों की रिपोर्ट में भैंस की उम्र 4 से 5 साल के बीच पाई गई, जिससे रामलाल मेघवाल का दावा सही साबित हुआ. मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए भैंस और उसके पाड़े को रामलाल मेघवाल के सुपुर्द कर दिया.

थाना अधिकारी ने बताया कि विवाद बढ़ता देख निष्पक्ष जांच के लिए मेडिकल परीक्षण जरूरी था और रिपोर्ट के आधार पर ही असली मालिक को पशु सौंपे गए। यह मामला कोटा में चर्चा का विषय बना रहा.

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