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Rahul Dravid Vijeta Pendharkar: राहुल द्रविड़ और विजेता पेंढारकर की प्रेमकथा भारतीय क्रिकेट जगत की सबसे सादगी भरी और गहराई से जुड़ी कहानियों में से एक मानी जाती है, जिसकी शुरुआत क्रिकेट मैदान पर नहीं बल्कि परिवारों की पुरानी दोस्ती से हुई. विजेता के पिता, जो भारतीय वायुसेना में विंग कमांडर थे, 1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के शुरुआती वर्षों में बेंगलुरु में द्रविड़ परिवार के पड़ोस में रहते थे, और यह पड़ोसपन धीरे-धीरे एक गहरे पारिवारिक रिश्ते में बदल गया.
समय बीतने के साथ दोनों परिवारों की नजदीकियां बढ़ती गईं, जिससे राहुल और विजेता के मिलने-जुलने की स्वाभाविक परिस्थितियाँ बनीं. राहुल शुरुआत में नागपुर में विजेता के घर विजिट पर जाते थे, जहां मिलने-जुलने और बातचीतों के जरिए उनकी दोस्ती मजबूत हुई और धीरे-धीरे यह मित्रता रोमांटिक रिश्ते में बदल गई.
महाराष्ट्रीयन रीति-रिवाजों के साथ शादी
दोनों महाराष्ट्रीयन परिवारों से होने और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि साझा करने ने रिश्ते को सहज और स्वीकृत बनाया. परिवारों की सहमति और दोनों के बीच पनपते गहरे भावनात्मक जुड़ाव ने इस रिश्ते को औपचारिक रूप लेने की दिशा में आगे बढ़ाया और अंततः 4 मई 2003 को बेंगलुरु में एक पारंपरिक महाराष्ट्रीयन रीति-रिवाजों के साथ उनकी शादी हुई—जहाँ इसे प्यार और अरेंजमेंट के खूबसूरत संगम के रूप में देखा गया.
शादी के बाद विजेता, जो पेशे से एक योग्य मेडिकल सर्जन थीं, ने बड़े निर्णय के साथ अपने प्रोफेशन से पीछे हटने का फैसला किया ताकि राहुल द्रविड़ अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर में बिना किसी चिंता के आगे बढ़ सकें.
विजेता ने की दोनों बेटों की परवरिश
राहुल अक्सर मैदान से दूर और यात्रा में रहते थे, ऐसे में विजेता ने परिवार, घर और बाद में उनके दो बेटों—समित और अन्वय—की परवरिश की जिम्मेदारी को मुख्य भूमिका के रूप में अपनाया. यह त्याग न केवल द्रविड़ के करियर की सफलता में मजबूत सहायक रहा, बल्कि यह भी दिखाता है कि उनकी शादी एक ऐसी साझेदारी है जहाँ दोनों एक-दूसरे के सपनों और जिम्मेदारियों को बराबरी से महत्व देते हैं.
इस प्रकार, राहुल और विजेता की कहानी सिर्फ एक क्रिकेटर की लव स्टोरी नहीं, बल्कि भरोसे, सम्मान, पारिवारिक मूल्यों और आपसी सपोर्ट पर आधारित जीवन की एक प्रेरक मिसाल है.