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‘पहले शतक, फिर जवाब’ जब रवि शास्त्री ने सचिन तेंदुलकर को स्लेजिंग से रोका !

यह घटना भारतीय क्रिकेट इतिहास (Indian Cricket History) का एक मजेदार और दिलचस्प किस्सा (Funny Moments) मानी जाती है, जिसमें मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर (Master Blaster Sachin Tendulkar) और ऑलराउंडर रवि शास्त्री Ravi Shashtri) के बीच मैदान पर हुआ एक छोटा-सा संवाद आज भी प्रशंसकों को मुस्कुराने पर मजबूर कर देता है.

Published by DARSHNA DEEP

Sachin Tendulkar and Ravi Shastri: यह घटना तब की है जब सचिन तेंदुलकर भारतीय टीम में नए-नए शामिल हुए थे. युवा सचिन अपने जोश और ऊर्जा से बेहद ही भरे हुए थे और विपक्षी खिलाड़ियों को उसी अंदाज़ में जवाब देना उनका शौक बन चुका था. मैदान पर सचिन ने जब देखा कि विरोधी खिलाड़ी भारतीय बल्लेबाजों को तानों से परेशान करने की कोशिश कर रह हैं, तभी सचिन तेंदुलकर ने विरोध खिलाड़ियों को जवाब देनी की ठानी. लेकिन तभी उनके साथ क्रीज़ पर मौजूद अनुभवी खिलाड़ी रवि शास्त्री ने उन्हें ऐसा करने से पूरी तरह से रोक दिया. शास्त्री ने मुस्कुराते हुए क्या कहा जानने के लिए पूरी खबर पढ़िए. 

“तुम चुप रहो, पहले मुझे अपना शतक पूरा करने दो”

शास्त्री का यह जवाब मज़ाकिया अंदाज़ में था, जिसने हर किसी का दिल जीत लिया था. हांलाकि, वे यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि स्लेजिंग से खिलाड़ियों का पूरी तरह से ध्यान भी भटक सकता है. उनके मुताबिक, एक बल्लेबाज का फोकस रन बनाने पर होना चाहिए, न कि जुबानी जंग पर. सचिन ने भी शास्त्री की बात मानी और शांति से बल्लेबाजी पर जोर दिया. इसके बाद रवि शास्त्री ने अपना शतक आखिरका पूरा कर ही लिया. 

“अब जो कहना है, कह दो”

अपना शतक पूरा करते ही रवि शास्त्री ने सचिन से कहा कि “अब जो कहना है, कह दो”, इससे सुनने के बाद दोनों खूब हंसे और पल क्रिकेट के इतिहास में एक मजेदार याद के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. 

इस घटना से एक बात तो यह साफ है कि एक, रवि शास्त्री का व्यावहारिक अनुभव और परिपक्वता तो वहीं सचिन तेंदुलकर का शुरुआती जोश और खेल के प्रति जुनून ने हर भारतीय का दिल जीत लिया. यह घटना दर्शाती है कि क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, बल्कि सीखने, धैर्य रखने और सही समय पर प्रतिक्रिया देने की एक बेहतरीन कला में से एक है. 

आज भी जब पुराने क्रिकेटर और कमेंटेटर इस घटना का ज़िक्र करते हैं तो उन्हें भी हंसी आजाती है. क्रिकेट के इतिहास में इसे एक “फनी लेकिन इंस्पिरेशनल मोमेंट” कहा जाता है, जिसने यह दिखाया कि एक महान खिलाड़ी न सिर्फ बल्ले से बल्कि अपनी समझदारे से भी मैच जीत सकते हैं. 

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