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Pradosh Vrat 2025: प्रदोष व्रत क्यों रखा जाता है? जानें-क्यों पिया था भगवान शिव ने इस दिन विष

Pradosh Vrat 2025: प्रदोष व्रत में भगवान शिव की संध्या पूजा, उपवास और महामृत्युंजय का जाप किया जाता है. इस व्रत को करने से आपको भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और हिंदू धर्म में इस व्रत को करना काफी शुभ माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव ने विष पिया था, तो आइए जानते हैं इसके पीछे की कहानी और व्रत कथा के बारे में.

Published by Shivi Bajpai

Pradosh Vrat 2025: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को बहुत शक्तिशाली और पवित्र माना जाता है. इस दिन भक्त पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ उपवास रखते हैं. ये व्रत अच्छे स्वास्थ्य, मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और मोक्ष प्राप्ति के लिए रखा जाता है.  ‘प्रदोष’ शब्द का अर्थ है रात का आरंभिक भाग या संध्या का समय. इसलिए ये व्रत हमेशा संध्याकाल में किया जाता है. शिव पुराण के अनुसार, इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इस व्रत को आप हर चंद्र मास की त्रयोदशी तिथि पर रख सकते हैं. सातों प्रदोष व्रतों में शनिवार को आने वाला शनि प्रदोष व्रत और सोमवार को आने वाला सोम प्रदोष व्रत बहुत शुभ माना जाता है.

प्रदोष व्रत कथा (Pradosh Vrat Katha)

स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव से जुड़ी ये एक प्रसिद्ध कथा है. इस कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन हुआ था. तब भगवान शिव ने ब्रह्मांड की रक्षा के लिए विष पी लिया था. इसी घटना को याद करते हुए प्रदोष व्रत रखा जाता है. सतयुग से पहले ही देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था.  अमृत प्राप्ति के लिए उन्होंने विशाल सांप वासुकी को रस्सी की तरह प्रयोग किया था और इसके साथ ही समुद्र मंथन की शुरूआत हुई थी. इस मंथन में सबसे पहले विष निकला था. ये विष काफी प्रचंड था जो पूरे ब्रह्मांड का नाश कर सकता था. इसे देवता हो या असुर कोई नहीं सहन कर सकता था.  तब भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा करने  के लिए इस विष यानी की हलाहल को पी लिया. माता पार्वती ने उनके गले पर हाथ रख दिया ताकि ये विष उनके गले से नीचे न जाएं. इसी कारण उनका गला नीला पड़ गया. जिससे उन्हें नीलकंठ का नाम दिया गया. जिस दिन भगवान शिव ने इस विष की अंतिम बूंद पी उसी दिन को प्रदोष व्रत के रूप में मनाया जाने लगा था.

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प्रदोष व्रत कैसे करें?

प्रदोष व्रत का दिन सुख-समृद्धि और कल्याण का प्रतीक माना जाता है. इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने का विशेष महत्व है. इस दिन भक्त सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें फिर दिनभर संयम और भक्ति के भाव में रहें.
संध्या यानी की शाम के समय मंदिर जाकर भगवान शिव और माता पार्वती के दर्शन करना शुभ माना जाता है. पूजा की शुरुआत भगवान शिव और पार्वती को प्रसन्न करने के लिए की जाने वाली प्रार्थना और मंत्रोच्चर से होती है. इसके बाद अन्य देवताओं की पूजा की जाती है. भक्त घी का दीया जलाएं और श्रद्धा के साथ शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र को चढ़ाएं.

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व्रत करने का सही तरीका क्या है?

हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रदोष व्रत रखने के दो तरीके होते हैं. पहला तरीका यह है कि जो भी भक्त ये व्रत करना चाहते हैं वो सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक 24 घंटे का उपवास करते हैं. अगले दिन प्रात: स्नान करके भगवान शिव की आराधना करने के बाद ही व्रत तोड़ते हैं. दूसरे तरीका में भक्त सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं. इसलिए इस अवधि में पूजा करने से भक्तों को शुभ फल की प्राप्ति होती है.  संध्या के समय शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और पुष्प अर्पित करना शुभ माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन उपवास करने से भगवान शिव और मां पार्वती की कृपा आप पर बनी रहती है. 

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. इनखबर इस बात की पुष्टि नहीं करता है)

Shivi Bajpai
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