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Mathura Holi tradition: मथुरा का अनोखा गांव, यहां होली पर चप्पल-जूते मारकर दिया जाता है आशीर्वाद

गोवर्धन तहसील के बछगांव में सैकड़ों वर्षों से जूता-चप्पल मारकर होली मनाने की अनोखी परंपरा चली आ रही है. इस दिन बड़े लोग अपने से छोटों को प्रतीकात्मक रूप से जूता-चप्पल मारकर आशीर्वाद देते हैं.

Published by Ranjana Sharma

Mathura Holi tradition: ब्रज की होली दुनियाभर में मशहूर है. बरसाना की लठमार होली, नंदगांव की लड्डू होली और वृंदावन की फूलों की होली देखने के लिए देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं. लेकिन मथुरा के पास एक ऐसा गांव भी है, जहां होली के मौके पर आशीर्वाद चप्पल और जूते मारकर दिया जाता है. सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन यह यहां की वर्षों पुरानी परंपरा है.

कहां है यह अनोखी परंपरा?

मथुरा के पास स्थित छंडगांव में होली का रंग कुछ अलग ही नजर आता है. यहां होली के दिन बड़े-बुजुर्ग अपने से छोटे लोगों को चप्पल या जूते से मारकर आशीर्वाद देते हैं. स्थानीय लोग इसे शुभ मानते हैं और इसे परंपरा का हिस्सा समझकर निभाते हैं.

क्या है मान्यता ?

गांव के लोगों के अनुसार, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. मान्यता है कि इस दिन बड़े अगर छोटों को चप्पल या जूते से प्रतीकात्मक रूप से मारते हैं तो यह उनके लिए सौभाग्य और रक्षा का संकेत होता है. इसे बुराइयों को दूर करने और जीवन में खुशहाली लाने का प्रतीक माना जाता है. इस दौरान माहौल पूरी तरह हंसी-मजाक और उत्साह से भरा रहता है. कोई नाराजगी नहीं होती, बल्कि लोग इसे प्रेम और आशीर्वाद के रूप में स्वीकार करते हैं.

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अंग्रेजों के जुल्म के विरोध में शुरू हुई थी यह परंपरा

स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह परंपरा देश में अंग्रेजों द्वारा किए गए अत्याचारों के विरोध के प्रतीक के रूप में शुरू हुई थी. होली के अवसर पर जूता-चप्पल मारकर उस दौर के अन्याय के खिलाफ आक्रोश प्रकट किया जाता था. समय के साथ यह एक परंपरा में बदल गई, जो आज भी निभाई जा रही है. सिर्फ विरोध ही नहीं, बल्कि इस परंपरा के जरिए युवाओं को सकारात्मक सोच अपनाने और सही दिशा में आगे बढ़ने का संदेश भी दिया जाता है. बुजुर्ग इस मौके पर होली, ब्रजगीत और रसिया गाकर माहौल को भक्तिमय बना देते हैं. इसके बाद भजन-कीर्तन का आयोजन होता है, जिसमें पूरा गांव शामिल होता है.

ब्रज की 40 दिन की होली

  • ब्रज में होली का उत्सव बसंत पंचमी से शुरू होकर करीब चालीस दिन तक चलता है.
  • बरसाना की लठमार होली – जहां महिलाएं पुरुषों को लाठियों से प्रतीकात्मक प्रहार करती हैं.
  • नंदगांव की लड्डू होली – जहां श्रद्धालुओं पर लड्डू बरसाए जाते हैं.
  • वृंदावन की फूलों की होली – जहां रंगों की जगह फूलों से होली खेली जाती है.
  • इन्हीं अनोखी परंपराओं की कड़ी में छंडगांव की ‘जूता-चप्पल होली’ भी शामिल है.

संस्कृति और आस्था का संगम

ब्रज की होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है. छंडगांव की यह परंपरा भले अलग लगे, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह प्रेम, आशीर्वाद और परंपरा का प्रतीक है. ब्रज की धरती पर होली का हर रंग एक नई कहानी कहता है और छंडगांव की यह परंपरा उसी अनोखी विरासत का हिस्सा है.

Ranjana Sharma
Published by Ranjana Sharma

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