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Lohri 2026: दुल्ला भट्टी के बिना क्यों अधूरी है लोहड़ी की खुशियां? जानें रोचक कथा और गीत

Lohri 2026: लोहड़ी का पर्व सिख समाज में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. शादी के बाद पहली लोहड़ी और नवात शिशु के होने के बाद पहली लोहड़ी हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है. लोहड़ी मनाते समय लोक गीत दुल्ला भट्टी वाला गाया जाता है. इस गीत के बिना लोहड़ी का पर्व अधूरा माना जाता है.

Published by Tavishi Kalra

Lohri 2026: लोहड़ी का पर्व हर साल 13 जनवरी को मनाया जाता है. लोहड़ी सिख धर्म का प्रमुख त्योहार है. इस पर्व सिख और पंजाबी समाज के लोग बहुत ही हर्ष उल्लास के साथ मनाते हैं, लोहड़ी को लाल लोई के नाम से भी जाना जाता है. लोहड़ी के दिन रात के समय आग जलाकर उसमें गुड़, तिल, मूंगफली, रेवड़ी डाली जाती है और आग के चारों ओर परिक्रमा ली जाती है.

लोहड़ी के दिन पारंपरिक गाने गाए जाते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है ‘दुल्ला भटी वाला’. इन गीतों के बिना लोहड़ी का पर्व अधूरा माना जाता है. लोहड़ी के दिन क्यों गाए जाते हैं दुल्ला भट्टी के गीत. आइए जानते हैं क्या है दुल्ला भट्टी की कहानी और जानें पढ़ें पूरी गीत.

सुंदर मुंदरिये हो !
तेरा कौन विचारा हो !
दुल्ला भट्टी वाला हो !
दुल्ले धी व्याही हो !
सेर शक्कर पाई हो !
कुड़ी दे जेबे पाई
कुड़ी दा लाल पटाका हो !
कुड़ी दा सालू पाटा हो !
सालू कौन समेटे हो !
चाचे चूरी कुट्टी हो !
ज़मिदारां लुट्टी हो !
ज़मींदार सदाए हो !
गिन-गिन पोले लाए हो !
इक पोला रह गया !
सिपाही फड के लै गया !
सिपाही ने मारी ईट
भावें रो भावें पिट
सानू दे दे लोहड़ी
तुहाडी बनी रवे जोड़ी !

दुल्ला भट्टी की कथा

दुल्ला भट्टी अपनी बहादुरी और गरीबों के प्रति अपनी दया के लिए जाने जाते हैं. लोक कथाओं के अनुसार, मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान, दुल्ला भट्टी युवा लड़कियों को गुलामी में बेचे जाने से बचाते थे. वह उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाता और उनकी शादी के लिए दहेज भी देता.

एक अन्य कहानी के मुताबिक एक गांव में सुंदरदास नामक किसान रहा करता था. उसकी सुंदरी और मुंदरी नाम की दो बेटियां थीं. इन दोनों लड़कियों की जबरदस्ती शादी करवाई जा रही थी. दुल्ला भट्टी ने मौके पर पहुंचकर इस शादी को रुकवा दिया था. इसके बाद दोनों लड़कियों की शादी खुशी-खुशी उचित वरों से करवाई गई.

हर साल लोहड़ी के दौरान इन गीतों को गाकर दुल्ला भट्टी का गीत गाया जाता है. हर साल यह पर्व हर परिवार में लोग गाते हैं और आगे आने वाली पीढ़ियों को उनकी विरासत को याद रखने और उनका सम्मान करने का अवसर देता है.

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Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. Inkhabar इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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