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Khatu Shyam Baba: हारे का सहारा ‘खाटू श्याम’, क्यों भगवान श्री कृष्ण ने इन्हें कलयुग में पूजे जानें का दिया वरदान?

Khatu Shyam Baba: राजस्थान के सीकर जिले में खाटू श्याम जी का मंदिर करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र माना जाता है. इन्हें 'हारे का सहारा' और 'शीश का दानी' जैसे नामों से जाना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं उन्हें कलियुग में 'श्याम' नाम से पूजे जाने का वरदान दिया था. लेकिन, महाभारत काल के इस वीर योद्धा को यह वरदान क्यों मिला, आइए जानते हैं इसके पीछे की वजह के बारे में.

Published by Shivi Bajpai

Khatu Shyam Baba Ki Puja: भारत को आस्था की भूमि माना जाता है. यहां प्रत्येक देवी दवताओं की कथा किसी न किसी की प्रेरणा है. ऐसी ही एक अद्भुत कथा है खाटू श्याम बाबा की जिन्हें हारे का सहारा कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार जो भक्त सच्चे मन से श्याम बाबा का नाम लेते हैं उनके सारे कष्टों का निवारण हो जाता है. इस साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी 1 नवंबर के दिन है इसे देवउठनी एकादशी के रूप में जाना जाता है. इस दिन ‘कलयुग के श्याम’ खाटू श्याम बाबा का जन्मदिन काफी धूमधाम से मनाया जाता है. 

कौन थे वो वीर बर्बरीक?

खाटू श्याम जी वास्तव में महाभारत काल के वीर बर्बरीक थे. उनका संबंध पांडव काल से था. वे भीम के पौत्र थे. उनके पिता घटोत्कच और माता का नाम मौरवी था. बर्बरीक बचपन से ही काफी बलशाली थे. उन्हें देवी चंडिका से तीन दिव्य और अचूक बाण प्राप्त हुए थे. ये बाण पलभर में तीन लोकों को नष्ट करने की क्षमता रखते थे और लक्ष्म को भेद कर वापस उनके पास आ सकते थे. इसी कारण उन्हें ‘तीन बाण धारी’ भी कहा जाता है. 

शीश दान की महान गाथा क्या है?

जब महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था, तब बर्बरीक ने इसमें शामिल होने का निर्णय लिया था. युद्ध में जानें से पहले उन्होंने उन्होंने अपनी मां को वचन दिया था कि वह हमेशा ‘हारे हुए पक्ष’ का साथ देंगे. भगवान श्री कृष्ण ये जानते थे कि बर्बरीक की शक्ति इतनी अपार है कि उनके तीन बाणों के बल पर हारे हुए पक्ष (कौरवों) का साथ वो देंगे, तो युद्ध का परिणाम बदल सकता है.

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ब्राह्मण रूप में श्री कृष्ण आए

श्री कृष्ण ने ब्राह्माण का भेष धारण करके बर्बरीक को रोककर उनसे दान मांगा था. बर्बरीक ने वचन दिया था कि वे जो भी मांगेंगे, वह उन्हें अवश्य देंगे. तब श्री कृष्ण ने उनसे दक्षिणा के रूप में उनका सिर (शीश) मांग लिया था. बर्बरीक ने बिना किसी संकोच के सिर काटकर श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया था. इसी महान त्याग की वजह से और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दे दिया. 

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श्रीकृष्ण ने क्यों दिया ‘श्याम’ नाम से पूजे जाने का वरदान?

वीर बर्बरीक के इस अद्वितीय बलिदान से भगवान श्रीकृष्ण बहुत ही प्रसन्न हुए. साथ ही, बर्बरीक ने अपनी इच्छा व्यक्त की थी कि वह अपनी आंखों से महाभारत के पूरे युद्ध को देखना चाहते हैं. बर्बरीक ने अपने वचन और धर्म की रक्षा के लिए बिना किसी संकोच के अपना शीश दान कर दिया. उनके इस महान त्याग और श्रीकृष्ण के प्रति अटूट भक्ति से प्रभु भावुक हो गए. श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलियुग के आगमन पर वह ‘श्याम’ (जो कि श्रीकृष्ण का ही एक नाम है) के नाम से जाने और पूजे जाएंगे.श्रीकृष्ण ने यह भी कहा कि जो भी भक्त उनके नाम का स्मरण करेगा, उसके सभी कष्ट दूर होंगे और उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होगी. इसके साथ ही, उन्हें यह आशीष भी दिया कि वह हमेशा हारे हुए और निराश भक्तों को सहारा देंगे.

Khatu Shyam Baba: महाभारत में खाटूश्याम जी की भूमिका क्या थी? बर्बरीक की कथा के बारे में जानें यहां

(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. इनखबर इस बात की पुष्टि नहीं करता है)

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