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Amavasya Vrat Katha: मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, मिलेगी कष्टों से मुक्ति

Amavasya Vrat Katha: मार्गशीर्ष माह की अमावस्या को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. भगवान श्रीकृष्ण ने 'गीता' में स्वयं कहा है कि "महीनों में मैं मार्गशीर्ष माह हूँ". सतयुग में देवों ने मार्गशीर्ष मास की प्रथम तिथि को ही वर्ष का प्रारम्भ किया था. मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है. यहां पढ़ें मार्गशीर्ष अमावस्या की व्रत कथा.

Published by Tavishi Kalra

Amavasya Vrat Katha: एक नगर में गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था. उस परिवार में पति-पत्नी और उसकी एक पुत्री थी. समय गुजरने के साथ-साथ पुत्री धीरे-धीरे बड़ी होने लगी. वह कन्या सुंदर, संस्कारवान और गुणवान थी लेकिन गरीब होने की वजह से उसकी शादी नहीं हो पा रही थी. एक दिन उस ब्राह्मण के घर एक साधु महाराज आए. कन्या ने साधु की खूब सेवा की. साधु उस कन्या के सेवाभाव से इतने प्रसन्न हुए कि उस कन्या को उन्होंने लंबी आयु का आशीर्वाद दिया लेकिन साथ में ये भी कहा कि इस कन्या के हाथ में विवाह योग्य रेखा नहीं है.

तब ब्राह्मण दम्पति ने साधु से इसका उपाय पूछा. साधु महाराज ने कुछ देर सोचने के बाद अपनी अंतर्दृष्टि में ध्यान करके बताया कि यहां से कुछ ही दूरी पर एक गांव में सोना नाम की धोबिन महिला अपने बेटे और बहू के साथ रहती है, जो संस्कार संपन्न तथा पति परायण है.यदि यह कन्या उस धोबिन की सेवा करे और बदले में वह महिला प्रसन्न होकर इसकी शादी में अपने मांग का सिंदूर लगा दे और उसके बाद इस कन्या का विवाह हो जाए. तो इससे कन्या का वैधव्य योग नष्ट हो जाएगा. साधु ने ये भी बताया कि वह महिला कहीं आती-जाती नहीं है.

यह सुनकर ब्राह्मणी ने अपनी बेटी से धोबिन की सेवा करने कहा. अगले दिन से ही कन्या प्रात: काल उठ कर सोना धोबिन के घर जाती और वहां जाकर उसके घर की साफ-सफाई और अन्य सारे कार्य करके अपने घर वापस लौट आती. एक दिन सोना धोबिन ने अपनी बहू से पूछा कि, तुम तो सुबह ही सारे काम कर लेती हो और मुझे पता भी नहीं चलता. बहू ने कहा: मां जी, मैंने सोचा कि आप ही सुबह उठकर सारे कर रही हैं क्योंकि मैं तो देर से उठती हूं. यह सब जानकार दोनों सास-बहू अपने घर की निगरानी करने लगी कि आखिर कौन है जो सुबह घर आकर सारा काम करके चला जाता है.

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तब कन्या ने साधु द्बारा कही गई बात सोना धोबिन को बताई. सोना धोबिन पति परायण थी और उसमें तेज था. वह उस कन्या की मदद करने के लिए तैयार हो गई, सोना धोबिन के पति थोड़ा अस्वस्थ थे. उसने अपनी बहू से अपने लौट आने तक घर पर ही रहने को कहा.

सोना धोबिन ने जैसे ही उस कन्या की मांग में अपना सिन्दूर लगाया, सोना धोबिन का पति मर गया. उसे इस बात का पता चल गया. सोना धोबिन उस दिन अपने घर से निराजल ही चली थी, यह सोचकर कि रास्ते में उसे कहीं पीपल का पेड़ मिलेगा तो वह उसे भंवरी देकर और परिक्रमा करके ही जल ग्रहण करेगी.

उस दिन अमावस्या थी. ब्राह्मण के घर से मिले पूए-पकवान की जगह सोना धोबिन ने ईंट के टुकड़ों से 108 बार भंवरी देकर 108 बार पीपल के पेड़ की परिक्रमा की और उसके बाद ही जल ग्रहण किया. ऐसा करते ही उसका पति फिर से जिंदा हो गया.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. Inkhabar इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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