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Amla navami Katha in Hindi: आज अक्षय नवमी के दिन आंवले के पड़े के नीचे बैठकर जरूर पढ़ें ये कहानी

Amla Navami Ki Katha In Hindi: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी का पर्व मनाया जाता है. कई जगहों पर इसे इच्छा नवमी, अक्षय नवमी, कूष्मांड नवमी, आरोग्य नवमी और धातृ नवमी के नाम से भी जाना है. इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है और कहा जाता है कि आंवले के पेड़ को विष्णु जी का वास होता है. चलिए पढ़ते हैं यहां आंवला नवमी की कहानी

Published by chhaya sharma

Akshaya Navami Ki Kahani In Hindi: आंवला नवमी का पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि मनाया जाता हैं. कई जगहों पर इसे पर्व को इच्छा नवमी, अक्षय नवमी, कूष्मांड नवमी, आरोग्य नवमी और धातृ नवमी के नाम से भी जाना है. आंवला नवमी के दिन भगवान विष्णु जी और आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि आंवले के पेड़ को विष्णु जी का वास होता है. आंवला नवमी के दिन कुछ लोग व्रत भी करती हैं. इसके अलावा इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करनी चाहिए और कथा पढ़नी चाहिए. ऐसा करने से अक्षय फल प्राप्त होता है

आंवला नवमी की कथा (Amla Navami Ki Katha)

प्राचीन काल की बात है, कावेरी नदी के पास देव शर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जो वेदों को पढ़ता था और इसमें विद्वान था. उसका एक पुत्र भी था, जिसका व्यवहार खराब था. एक दिन पिता यानी देवशर्मा ने अपने बेटे से कहा – इस समय कार्तिक का महीना चल रहा है, जो भगवान् विष्णु को बहुत ही प्रिय है. तुम कार्तिक मास में स्नान करो, दान को और श्री हरि के लिए व्रत यबी करो,  इसके अलावा तुलसी के साथ-साथ भगवान् विष्णु की पूजा करो. तुलसी के पास दिया जलाओं और दीपदान करो. पिता की ऐसी बाते सुनकर पुत्र को गुस्सा आ गया. उसने अपने पिता को अपशब्द कहे और बोला – मैं कार्तिक में पुण्य-संग्रह नहीं करूंगा. पुत्र का यह वचन सुनकर विद्वान को भी क्रोध आया और उन्होंने कहा- दुर्बुद्धि तू वृक्ष के खोखले में चूहा हो जा. ‘इस श्राप के भय से डरकर पुत्र ने पिता से क्षमा मांगी श्राप का कारण और इस योनि से श्राप से मुक्ति पाने का उपाय पुछा और पुत्र के विनती करने पर ब्राह्मण ने श्राप का कारण बताया- जब तुम भगवान को प्रिय लगने वाले कार्तिक व्रत का माहात्म्य सुनोगे, उस समय उस कथा के सुनने मात्र से तुम्हारी मुक्ति हो जाएगी. पिता के ऐसा कहने पर वह चूहा बन गया और वो वनों में धूमता रहा. एक दिन कार्तिक मास में विश्वामित्रजी अपने शिष्यो के साथ वहां आए. वो भगवान की पूजा के लिए आंवले की छाया में बैठे. उन्होने अपने शिष्यो को कार्तिक मास का महत्व बताया. उसी समय कोई एक शिकारी वहां आया, उसने ऋषियों को डराया और मारने की धमकी दी. लेकिन महात्मा के दर्शन मात्र से उसकी बुद्धि ठीक हो गई. उसने ब्राह्मणों को नमस्कार करके कहा-आपलोग यहां क्या कर रहे हैं, मेरी जानने के इच्छा है ? उसके पूछने पर विश्वामित्र बोले-कार्तिक मास सब महीनों श्रेष्ठ बताया जाता है. उसमे जो कर्म किया जाता है, वह बरगद के बीज की तरह बढता है. व्याध को प्रेरणा से विश्वामित्रजी के कहे हुए इस धर्म को सुनकर वह शिवशर्मा के बेटे ब्राह्मण कुमार का श्राप भी मुक्त हुआ और वो चूहे का शरीर छोड़कर तत्काल दिव्य देह से युक्त हो गया. इस प्रकार वो विश्वामित्र को प्रणाम करके स्वर्गको चला गया. शिकारी भी तब से कार्तिक मास के नियमों का पालन करने लगा.

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आंवला नवमी का है माता लक्ष्मी से संबंध

माता लक्ष्मी से जुड़ी है आंवला नवमी की कथा है. पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण करने आई थी और रास्ते में उन्हें भगवान विष्णु और शिव की पूजा करने की इच्छा हुई. लक्ष्मी मां ने सोचा कि वो विष्णु और शिव की पूजा  एक साथ कैसे हो सकती है. तभी उन्हें ख्याल आया कि तुलसी और बेल का गुण आंवले में पाया जाता है. तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल महादेव को. ऐसे में आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर मां लक्ष्मी ने आंवला वृक्ष की पूजा की थी.  मां लक्ष्मी जी की भक्ती और पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और शिव जी ने उन्हें दर्शन दिए. इसके बाद  लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोग लगाया और स्वयं भोजन किया. तब से यह परंपरा चली आ रही है.

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