Himalayan pink salt: इन दिनों रसोई से लेकर सोशल मीडिया तक हिमालयन पिंक सॉल्ट यानी सेंधा नमक को ज्यादा शुद्ध और ज्यादा हेल्दी बताकर पेश किया जा रहा है. दावा किया जाता है कि इसमें मौजूद ट्रेस मिनरल्स इसे साधारण आयोडीन युक्त नमक से बेहतर बनाते हैं. लेकिन क्या यह सच है या स्मार्ट मार्केटिंग? न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार ने इस पर वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर स्थिति साफ की है.
सफेद और गुलाबी नमक में फर्क
डॉ. कुमार के अनुसार, हिमालयन पिंक सॉल्ट में आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम जैसे सूक्ष्म खनिज (ट्रेस मिनरल्स) जरूर पाए जाते हैं, लेकिन इनकी मात्रा बेहद कम होती है. इतनी कम कि रोजमर्रा के सेवन से शरीर को कोई खास अतिरिक्त पोषण लाभ नहीं मिलता. नमक का मुख्य घटक सोडियम क्लोराइड ही होता है, चाहे वह सफेद हो या गुलाबी. इसलिए पोषण के लिहाज से दोनों में बुनियादी फर्क बहुत सीमित है.
ज्यादा नमक का सेवन खतरनाक
ब्लड प्रेशर को लेकर भी कई दावे किए जाते हैं कि पिंक सॉल्ट ज्यादा सुरक्षित है. डॉक्टर्स का कहना है कि यह धारणा सही नहीं है. दोनों तरह के नमक में सोडियम की मात्रा लगभग समान होती है और अधिक सोडियम का सेवन हाई ब्लड प्रेशर का जोखिम बढ़ाता है. यानी ज्यादा नमक, चाहे वह किसी भी रंग का हो, हृदय और रक्तचाप के लिए हानिकारक हो सकता है.
कौन सा नमक फायदेमंद?
भारत जैसे देश में आयोडीन युक्त नमक की अहमियत और बढ़ जाती है. आयोडीन दिमाग के विकास और थायरॉयड ग्रंथि के सही कामकाज के लिए जरूरी है. आयोडीन की कमी से घेंघा (गॉयटर), बच्चों में मानसिक विकास में कमी और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. देश में दशकों तक आयोडीन की कमी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या रही है, जिसे आयोडीन युक्त नमक के जरिए काफी हद तक नियंत्रित किया गया. डॉ. सुधीर कुमार का कहना है कि जिन लोगों के आहार में आयोडीन के अन्य पर्याप्त स्रोत नहीं हैं, उनके लिए आयोडीन युक्त नमक बेहद जरूरी है. सिर्फ ट्रेंड या स्वाद के कारण पिंक सॉल्ट को पूरी तरह अपनाना और आयोडीन युक्त नमक छोड़ देना समझदारी नहीं है, खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए.
विज्ञापन नहीं, विज्ञान पर करें भरोसा
हिमालयन पिंक सॉल्ट को चमत्कारी बताने के दावे वैज्ञानिक रूप से मजबूत नहीं हैं. नमक का रंग बदलने से उसका मूल प्रभाव नहीं बदलता. स्वास्थ्य के लिहाज से सबसे अहम बात है नमक का सीमित सेवन और आयोडीन की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करना. विज्ञापनों से ज्यादा भरोसा विज्ञान पर करना ही बेहतर विकल्प है.

