छुपान-छुपाई से लेकर मोबाइल की स्क्रीन तक, क्या नई पीढ़ी के बच्चे खो रहे हैं अपनी असली ताकत?

जहां एक समय में बच्चे घर से बाहर खेलने को (Playing outside from home) प्राथमिकता देते थे, तो वहीं नई पीढ़ी (New Generation Kids) के बच्चे घर के अंदर मोबाइल (Using Mobile Phone) चलाना ज्यादा पसंद करते हैं.

Published by DARSHNA DEEP

From playgrounds to mobile screen:  एक दौर ऐसा भी था जहां बच्चे घर से बाहर खेलना खूब पसंद करते थे. पढ़ाई-लिखाई को छोड़कर बच्चों का खेलकूद में बड़ा ही मन लगता था. माँ भी जबरन अपने बच्चे को घर से बाहर खेलने के लिए भेजती थी, ताकि बच्चे की सेहत फीट रह और उसे आलास का शिकार होना न पढ़े. लेकिन, आज ये दौर बी है जहां, नई पीढ़ी के बच्चे घर से बाहर निकलना पसंद ही नहीं करते हैं. घर में बैठक सिर्फ और सिर्फ फोन चलाना ही अब इनकी ज़िंदगी बन चुकी है. 90 के दशक में बच्चे शाम के समय छुपन-छुपाई, खो-खो से लेकर बर्फ-पानी खेलना बेहद ही पसंद करते थे. लेकिन, स्मार्टपोन और सोशल मीडिया के लगातार बढ़ते क्रेज़ ने बच्चों पर सभी ज्यादा और गहरा असर छोड़ा है. 

शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव?

जानकारी के मुताबिक, बाहर खेल-कूद करने से आप न सिर्फ स्वास्थ्य रहते हैं, बल्कि खुद को बहुत ज्यादा फीट भी महसूस करते हैं. मोटापा, हड्डियों का तेज़ी से कमज़ोर होना या फिर आलास जैसी बीमारियों से आपको बचाने में बेहद ही मदद करता है. लेकिन, आज के समय के बारे में विस्तार से बात करें तो, बच्चों में ‘सेडेंटरी लाइफस्टाइल’ लगातार बढ़ती जा रही है, जिसकी वजह से ज्यादातर बच्चों में मोटापा, कमज़ोर हड्डियां या फिर आलास जैसी गंभीर समस्याएं काफी देखने को मिल रही है. 

सहनशक्ति और मानसिक मजबूती

तो वहीं, दूसरी तरफ मैदान पर खेलने से न सिर्फ शरीर, बल्कि मानसिक सहनशक्ति भी तेजी से विकसित होती है. इसके साथ ही तेज धूप में खेलना या गिरने के बाद फिर से उठकर दौड़ना बच्चों में खेल के प्रति एक उत्साह पैदा करने का काम करता है. 

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सामाजिक और इंद्रिय विकास

दरअसल, बाहरी खेल बच्चों को टीम वर्क और सामाजिक संवाद सिखाने का सबसे बेहतरीन तकनीक है. धूप, मिट्टी और हवा के संपर्क में रहने से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी (Immunity) लगातार बढ़ने लगती है. तो वहीं, दूसरी तरफ दिनभर घर में बैठकर मोबाइल चालने से आंखों पर तनाव मानसिक विकास कम होने लगता है, जिसे पढ़ने में कई परेशानियों का सामना भी करना पड़ सकता है. 

वो दिन भी क्या दिन थे….

90 के दशक के खेल जैसे खो-खो और छुपान-छुपाई बच्चों में खेल को लेकर उत्साह पैदा करने का काम करता था, तो वहीं घंटोभर मोबाइल चलाना बच्चों के लिए बेहद ही आम बात है. लेकिन, माता-पिता को इस बात पर खास तौर से ध्यान देने की सबसे ज्यादा ज़रूरत है कि छोटे बच्चों को जितना हो सके मोबाइल से दूर ऱकने की सख्त से सख्त ज़रूरत है. इस बात पर ध्यान रखें कि जिता आपका बच्चा घर से बाहर निकलकर खेलेगा उतना ही स्वस्थ्य और मानिसक रूप से शक्तिशाली भी बनेगा. तो वहीं स्क्रीन की लत लगते से आंखों के साथ, मोटापा जैसी गंभीर बीमारियों से बच्चों को कम उम्र में ही सामना करना पड़ सकता है. जितना ज्यादा बच्चे बाहर खेल-कूद करेंगे उतना ही उनकी सहनशक्ति भी बढ़ने लगेगी. 

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