Who is Arshad Madani: जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUH) भारत के प्रमुख इस्लामी विद्वानों का एक संगठन है. इसकी स्थापना साल 1919 में हुई थी. ये संगठन दारुल उलूम देवबंद की विचारधारा से जुड़े उलेमा को दिखाता है. आज ये संस्था देश में मुसलमानों के धार्मिक अधिकार, शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखती है.
जमीयत उलेमा-ए-हिंद की स्थापना नवंबर 1919 में हुई थी. इसे मौलाना अब्दुल बारी फरंगी महली और मुफ्ती किफायतुल्लाह देहलवी जैसे विद्वानों ने मिलकर शुरू किया. उस समय भारत पर ब्रिटिश शासन था और देश में आजादी की मांग तेज हो रही थी. इस संगठन ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में भाग लिया. ये महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के सपोर्ट में भी खड़ा रहा. जमीयत का रुख साफ था कि भारत एकजुट रहना चाहिए. उसने देश के बंटवारे का विरोध किया और संयुक्त भारत की वकालत की. उस दौर में इसका झुकाव कांग्रेस पार्टी के साथ देखा गया.
संगठन में मेल-मिलाप की कोशिश
साल 2008 में जमीयत उलेमा-ए-हिंद दो हिस्सों में बंट गई. एक धड़ा मौलाना अरशद मदनी के नेतृत्व में रहा, जबकि दूसरा धड़ा मौलाना उस्मान मंसूरपुरी (बाद में महमूद मदनी) के नेतृत्व में चला. साल 2022 में दोनों गुटों को फिर से एक करने की कोशिशों की खबरें सामने आईं. बताया गया कि संगठन को एकजुट करने के लिए बातचीत हुई.
मौलाना अरशद मदनी कौन हैं?
मौलाना अरशद मदनी जमीयत उलेमा-ए-हिंद के एक प्रमुख गुट के अध्यक्ष हैं. वे जाने-माने इस्लामी विद्वान हैं. वे मौलाना असद मदनी के भाई हैं और 2006 में उनके निधन के बाद नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली. मौलाना अरशद मदनी अल्पसंख्यकों के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते हैं. वे देवबंदी विचारधारा से जुड़े हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी सक्रिय रहते हैं.
वंदे मातरम् विवाद से संबंध
वंदे मातरम् को लेकर समय-समय पर देश में बहस होती रही है. मौलाना अरशद मदनी ने स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में इसे अनिवार्य रूप से गाने के फैसले पर आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि इस गीत के कुछ हिस्सों में देश को देवी के रूप में दिखाया गया है, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद (एक ईश्वर में विश्वास) के सिद्धांत से मेल नहीं खाता. इसलिए किसी को इसे गाने के लिए मजबूर करना धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है.
मौलाना मदनी ने ये भी कहा है कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की आजादी देता है. वे संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हैं, जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है. उनका तर्क है कि मुसलमान दूसरों को ये गीत गाने से नहीं रोकते, लेकिन उन्हें भी इसे गाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए. इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर ने जवाहरलाल नेहरू को सलाह दी थी कि वंदे मातरम् के केवल पहले दो अंतरे ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किए जाएं, क्योंकि बाद के हिस्से एकेश्वरवादी धर्मों की मान्यताओं से अलग हैं.

