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कुड़माई से कुर्बानी तक… आखिर क्या है इस अनोखी लव स्टोरी में?  प्रेमी-प्रेमिका ने एक-दूसरे को छुआ तक नहीं

usne kaha tha: 'उसने कहा था' बचपन का निश्चल प्यार है, जिसमें प्रेमिका को दिए वचनों को पूरा करने के लिए प्रेमी अपने प्राणों का बलिदान दे देता है. पवित्रता और कुर्बानी में लिपटी यह कहानी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में शामिल हो सकती है.

Published by JP Yadav

usne kaha tha: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लोगों ने अख़बारों में पढ़ा—फ़्रांस और बेलजियम 68वीं सूची. मैदान में घावों से मरा. नं. 77 सिख राइफ़ल्स जमादार लहना सिंह.’ लहना सिंह को भले ही लोग ना जानते हों… लेकिन उसकी लव स्टोरी ‘हीर-रांझा’ और ‘लैला मजनूं’ से कहीं ज्यादा पवित्र और हिम्मती है. लहना सिंह-सूबेदारनी की लव स्टोरी में दोनों ने एक-दूसरे चंद दिनों देखा होगा. वह भी लम्हों-लम्हों की किस्त में, लेकिन छुआ तो एक बार भी नहीं. फिर भी लहना सिंह और सूबेदारनी की लव स्टोरी सही मायने में अनोखी लव स्टोरी बन गई. हम यहां बात कर रहे हैं हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानी ‘उसने कहा था’ की. यह हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानी है? इस पर दो मत हो सकते हैं, लेकिन यह कहानी अंदाज, चरित्र और क्लाइमेक्स से लोगों की आंखों में आंसू जरूर ला देती है.  अबोध प्यार, समर्पण और त्याग की यह कहानी बताती है कि वचन और प्रेम दरअसल होता क्या है? चंद मुलाकात, बात और एक वचन के लिए प्रेमी अपना जीवन ही कुर्बान कर देता है. ‘उसने कहा था’ मौत से कुछ मिनटों से पहले अनगिनत बार ये वाक्य बोले थे कहानी के नायक लहना सिंह ने. चंद्रधर शर्मा द्वारा लिखी यह अनोखी प्रेम कहानी इसलिए भी है, क्योंकि प्रेमी-प्रेमिका ने कभी भी एक-दूसरे से ना तो प्यार भरी बातें की और ना ही एक-दूसरे को छुआ. यहां तक कि एक-दूसरे से प्यार का इजहार तक नहीं किया.  हम इस स्टोरी में बताएंगे आखिर क्यों है यह सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानी और लहना सिंह (कहानी का मुख्य किरदार) हमें क्या सिखाता है?

अमृतसर के एक चौक पर जन्मी लहना सिंह और सूबेदारनी की लव स्टोरी

पंजाब के अमृतसर की वह गली ‘उसने कहा था’ कहानी के इतिहास में ‘इतिहास’ बनने वाली थी. वर्ष 1900 का कोई महीना रहा होगा, जब उन दोनों की मुलाकात होनी थी. साधारण सी दुकान पर लड़के की अधूरी मोहब्बत का अफसाना शुरू होना था. अमृतसर की उस गली से निकलते ही चौक पर एक लड़का और एक लड़की मिले. बंबूकार्ट वालों के बीच में होकर चौक की एक दुकान पर लड़का हांफता हुआ आया. उसके बाल बता रहे थे कि वह लड़का सिख है और लड़की के ढीले सुथने से साफ था कि लड़की भी सिख है. यहां पर बता दें कि सुथना कुर्ती या कुर्ते के साथ पहनी जाने वाली एक ढीली-ढाली पोशाक है. इसे युवतियां और महिलाएं पहनती हैं. यह ढीला पायजामा या सलवार होता है, जो पंजाब में पारंपरिक पहनावे का हिस्सा है. करीब 12 बरस का यह लड़का अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था. लड़के ने दुकान पर खड़ी  एक लड़की को देखा तो देखता ही रह गया. 

तेरी कुड़माई हो गई? इसके जवाब में टूट गया था लहना सिंह का दिल

लड़के ने पूछ लिया- ‘तेरे घर कहां हैं?’ जवाब मिला -‘मगरे में और तेरे?’ लड़के ने बात आगे बढ़ाई -‘मांझे में, यहां कहां रहती है?’ लड़की ने फौरन जवाब दिया- ‘अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं.’ बातों-बातों में दोनों जान गए कि लड़का और लड़की अपने मामा के घर आए हैं. दोनों के ही मामा का घर गुरु बाज़ार में है. दुकानदार से सामान लेकर दोनों साथ-साथ चले. कुछ दूर जाकर लड़का साथ चल रही लड़की को देखकर मुस्कुराया और पूछ डाला- ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ इस पर लड़की कुछ आंखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गई. यह सुनकर लड़का मुंह देखता रह गया और फिर मुस्कुराता हुआ दही लेकर घर पहुंच गया. चंद मुलाकातें हुईं और एक दिन लड़के का सवाल वही था, लेकिन जवाब कुछ ओर. लड़के ने जैसे ही पूछा तेरी कुड़माई हो गई, जवाब मिला- मेरी कुड़माई हो गई. इसके बाद लड़के के भीतर कुछ टूट गया. वह बेतहाशा घर की ओर भागा. 

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Flashback में लिखी गई है कहानी

किसी भी साहित्यकार की रचना की सफलता यही है कि वह अपने किरदारों के जरिये लोगों के दिलों में उतर जाए. इस मामले में महान लेखक चंद्रधर शर्मा गुलेरी अपनी कहानी ‘उसने कहा था’ में बिल्कुल खरा उतरते हैं. यहां हम बता देते हैं कि ऊपर जिस लड़के का जिक्र है, उसका नाम है-लहना सिंह. कहानी शुरू होती है- अमृतसर के एक बाजार से और फिर पहुंच जाती है प्रथम विश्वयुद्ध में. यहां लहना सिंह ब्रिटिश सेना में है और जर्मनी के खिलाफ युद्ध में अपना जौहर दिखा रहा है. जैसा कि उपर ही बताया जा चुका है कि ‘उसने कहा था’  कहानी अमृतसर के बाजार में शुरू होती है. यहां 12 वर्षीय लहना सिंह पहली ही मुलाकात में 8 वर्षीय एक लड़की प्रेम कर बैठता है.

कुड़माई से कुर्बानी तक

लेखक शुरुआत में यह जानकारी दे देते हैं कि लड़की की कुड़माई (सगाई) हो चुकी है. इसके बाद प्रथम विश्व युद्ध की भूमि में जाने से पहले इत्तेफाक से लहना सिंह की सूबेदारनी (वही लड़की) से मुलाकात होती है. घर पर मुलाकात के दौरान लहना सिंह सूबेदारनी  को नहीं पहचान पाता, लेकिन वह पहचान लेती है. घर पर मुलाकात के दौरान सूबेदारनी अपने पति (हजारा सिंह) और बेटे (बोधा सिंह) की रक्षा का वचन मांगती है. वह यह भी कहती है कि मेरे पति और बच्चे की वैसे ही रक्षा करना जैसे अमृतसर के बाजार में उस लड़की यानी सूबेदारनी की रक्षा की थी.  

कहानी का शीर्षक और अंत पाठकों की आंंखों में ला देता है आंसू

दुनिया भर में प्रेम का एक ही अर्थ होता है-समर्पण और कुर्बानी. ऐसी कहानियां ही पसंद की गईं और सराही गईं, जिसमें खोने वाला महान बन गया. दरअसल, प्रेम देने का नाम है. जिसने पाया उसने खोया और खोकर कुछ पाने वाला अमर हो गया. प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में लहना सिंह ब्रिटिश सेना में जमादार है. सूबेदारनी (वह प्रेमिका जो, अमृतसर के एक चौक पर कई दफा मिली थी) को दिया वचन निभाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर बीमार बोधा और सूबेदार हजारा सिंह की रक्षा करता है. युद्ध में जर्मन दुश्मनों को पछाड़कर सूबेदारनी का वचन पूरा करने के सफल प्रयास में लहना खुद घायल हो जाता है. कहानी के अंत में वह सूबेदार से कहता है कि उसने कहा था (सूबेदारनी ने जो कहा था) मैंने वह कर दिया. लहना वतन और अपने प्रेम के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देता है. 

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