जब बैसाखी के दिन हुआ भीषण नरसंहार, पूरे देश में पसरा मातम; रूह कंपा देगा जलियांवाला बाग हत्याकांड

Jallianwala Bagh Hatyakand 13th April: 13 अप्रैल 1919 का वो मंजर आज भी लोगों के रोंगटे खड़े कर देता है. इस दिन बैसाखी की खुशियाों को मातम में बदल दिया गया. आइए जानते हैं उस दिन का खौंफनाक सच

Published by Preeti Rajput

Jallianwala Bagh Hatyakand 13th April: बैसाखी का पर्व पंजाब में नई फसल, खुशियों और उत्सव का प्रतिक माता जाता है. 13 अप्रैल 1999 को भी लोग जश्न और उल्लास में डूबे हुए थे. अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के आसपास रौनक लगी हुई थी. लोग अपने परिवार के साथ खुशियां मना रहे थे. लेकिन लोगों की खुशियों को ऐसी नजर लगी कि एक पल में सबकुछ बदल गया. उस दिन एक ऐसा काला इतिहास लिखा गया, जिसे भूल पाना शायद ही संभव हो पाए. बैसाखी का ये दिन जलियांवाला बाग से जुड़ता है, जहां कुछ फिरंगियों ने खुशियों के शौर को लोगों की चीख और खामोशी में बदल दिया. 

बैसाखी का जलियांवाला बाग हत्याकांड के कनेक्शन

अमृतसर के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल को हजारों लोगों की भीड़ एक साथ इकट्ठा हुई थी. कोई बैसाखी का त्योहार मनाने आया था, तो कोई सभा का हिस्सा बनने. उस दौरान पूरे शहर में कर्फ्य जैसे हालात देखने को मिल रहे थे, लेकिन लोगों को अंदाजा नहीं था, कि यह पल उनकी जिंदगी का सबसे भयानक पल होने वाला है. 15 से 20 हजार लोग उस बाग में मौजूद थे- जिसमें बच्चे, महिलाएं, जवान और बुजुर्ग सभी शामिल थे. 

जनरल डायर का रणनीति

ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंचा. जलियांवाला बाग से बाहर निकलने का केवल एक संकरा रास्ता हुआ करता था. जिसे सैनिकों ने घेर लिया, ताकी कोई भी बचकर बाहर न जा सकें. बिना किसी चेतावनी के डायर ने मासूम लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया. इसके बाद जो हुआ, वो लोगों की आत्मा को भी हिलाकर रख देता है. सैनिकों ने मासूम लोगों पर गालियां बरसानी शुरू कर दीं. लोग अपनी जान बचाने के लिए भागे, लेकिन निकलने का रास्ता बंद हो चुका था. सैकड़ों लोग जान बचाने के लिए वहां मौजूद कुएं में कूद पड़े, लेकिन किसी की जान नहीं बच पाई. लोग मदद की भीख मांगते रहे, लेकिन अंग्रेजों ने उनपर जरा भी रहम नहीं किया. बाग की मिट्टी खून से लाल हो चुकी थी. तारों तरफ बच्चों की चीख और लाशें पड़ी हुई थी. 

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1650 गोलियां चलाई गईं

जनरल डायर के सैनिकों ने करीब 10 मिनट तक अंधाधुंध गोलियां बरसाई. लगभग 1650 गोलियां चलाई गईं. फायरिंग तब तक होती रही, जब तक गोलियां खत्म नहीं हुई. अगले दिन जब कुएं और बाग से शव निकाले गए, तो हर तरफ खून और बेजान लाशें देखने को मिली. आधिकारिक आंकड़ों में केवल 379 मौतों की जानकारी दी गई. लेकिन इतिहासकारों के मुताबिक, ये संख्या करीब 1500 तक थी. जिनमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल थे. जलियांवाला बाग नरसंहार ने पूरे भारत को एक ऐसा दर्द दिया, जिसे आज तक वह भुला नहीं पाया है. आजादी के लिए लड़ी गई लड़ाइयों में से यह सबसे खोंफनाक लड़ाई साबित हुई. इस हत्याकांड के कारण लोगों के भीतर का डर गुस्से में बदल गया. इसके बाद महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन की शुरुआत की, जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलाने में अहम भूमिका निभाई.

Preeti Rajput

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