Sanjay Leela Bhansali Heart Attack: बॉलीवुड के फेमस फिल्ममेकर संजय लीला भंसाली को लेकर हाल ही में एक हैरान करने वाली खबर सामने आई थी. कहा गया कि उन्हें हार्ट अटैक आया है और उन्हें तुरंत कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती कराया गया. हालांकि, भंसाली की टीम ने इन खबरों को पूरी तरह से झूठा और निराधार बताया है.
24 फरवरी 1963 को जन्मे भंसाली अपने 63वें जन्मदिन का जश्न मना रहे थे. खबर आई थी कि पार्टी के दौरान माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया और भंसाली को अस्पताल ले जाया गया. नवभारत टाइम्स की मानें तो अब उनकी टीम ने साफ किया है कि फिल्ममेकर पूरी तरह से स्वस्थ हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की कोई जरूरत नहीं थी.
टीम का बयान: खबरें पूरी तरह झूठी
भंसाली की टीम ने कहा- भंसाली के अस्पताल में भर्ती होने की खबरें पूरी तरह झूठी और निराधार हैं. इसमें कोई सच्चाई नहीं है. वो बिलकुल स्वस्थ हैं. इस बयान ने उनकी फैंस की चिंता को काफी हद तक शांत किया है.
संजय लीला भंसाली की फिल्में और उनके योगदान
भंसाली को क्लासिक और पीरियड ड्रामा फिल्मों के लिए जाना जाता है. उन्होंने ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘देवदास’, ‘बाजीराव मस्तानी’ और ‘हीरामंडी’ जैसी यादगार फिल्में बनाई हैं, जो लंबे समय तक लोगों के दिलों पर राज करती रही हैं.
भव्य सेट और फिल्म का बजट
भंसाली की फिल्मों के सेट इतने भव्य होते हैं कि अक्सर वे एक सामान्य बॉलीवुड फिल्म के पूरे बजट के बराबर होते हैं. उनके सेट में कला, इतिहास और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जिससे लोग सीधे उस युग के वातावरण में पहुंच जाते हैं.
‘देवदास’ के लिए भंसाली ने ऐश्वर्या राय के लिए 600 साड़ियां डिजाइन करवाई थीं. इसके अलावा, चंद्रमुखी का कोठा और पारो का महल बनाने में करोड़ों रुपये खर्च हुए थे. भंसाली की फिल्मों में हमेशा महिलाओं को सशक्त और मजबूत रूप में दिखाया जाता है, चाहे वह ऐश्वर्या राय हों या सोनाक्षी सिन्हा.
मां से मिली प्रेरणा
भंसाली की मां, लीला भंसाली, ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने बच्चों को पालते हुए उन्हें प्रेरित किया. साड़ियों पर फॉल लगाना, छोटे मंच पर डांस करना और हमेशा मुस्कान बनाए रखना. इन सबने संजय को ये सीख दी कि उनकी फिल्मों में महिला किरदार हमेशा सशक्त और आत्मनिर्भर दिखें.
महिलाओं को शक्ति का रूप देने वाली फिल्में
एक इंटरव्यू में भंसाली ने कहा था कि ‘देवदास’ में उन्होंने ऐश्वर्या और माधुरी की मां को शक्ति का प्रतीक माना. यही कारण है कि उनकी फिल्मों में पुरुष किरदार अक्सर भावनात्मक रूप से कमजोर दिखते हैं, जबकि महिला किरदार प्रमुख और ताकतवर नजर आते हैं. ‘पद्मावती’ और ‘रामलीला’ जैसी फिल्मों में भी ये प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है.

