आ गया ही-मैन की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ का रिव्यू, धर्मेंद्र और जायदिप अहलावत ने किया कमाल..!

Ikkis Review: फिल्म इक्कीस 21 साल के वीर अरुण खेतरपाल की सच्ची बहादुरी दिखाती है. युद्ध और सम्मान की कहानी भावनात्मक रूप से छूती है, दर्शकों को गर्व से नहीं बल्कि खालीपन के साथ छोड़ती है.

Published by sanskritij jaipuria

Ikkis Movie Review: आज सिनेमाघरों में धर्मेंद्र जी की फिल्म इक्कीस रिलीज हो गई है. सिनेमाघर से बाहर निकलते लोगों के गले में एक भारी भाव बैठ गया. ये सिर्फ इसलिए नहीं कि हम धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म देख रहे थे, बल्कि इसलिए भी कि फिल्म ने जो सच्चाई दिखाई, वो सीधा दिल को छू गई.

फिल्म का मेन रोल, 21 साल के PVC अरुण खेतरपाल, केवल एक किरदार नहीं है, बल्कि ऐसी बहादुरी का उदाहरण है जो आज लगभग मिथक जैसी लगती है. निर्देशक श्रीराम राघवन ने इस कहानी को बड़े संवेदनशील अंदाज में पर्दे पर उतारा है.

इक्कीस की कहानी

फिल्म की शुरुआत 1971 के युद्ध की झलक से होती है. अरुण (अगस्त्य नंदा), जो कि एक टैंक कमांडर हैं, पाकिस्तान के साथ युद्ध के लिए निकलते हैं. वर्तमान समय, कारगिल युद्ध के बाद, उनके पिता ब्रिगेडियर एमएल खेतरपाल (धर्मेंद्र) पाकिस्तान में कॉलेज री यूनियन के लिए जाते हैं. वहां तनाव स्वाभाविक रूप से बढ़ा हुआ है.

ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नसीर (जैदीप अहलावत) और उनके परिवार द्वारा उनका स्वागत किया जाता है. नसीर की पत्नी बार-बार खेतरपाल से कुछ छुपाने की कोशिश करती हैं. इस रहस्य के इर्द-गिर्द कहानी आगे बढ़ती है.

फिल्म रिव्यू

निर्देशक श्रीराम राघवन हमेशा छोटे-छोटे विवरणों पर ध्यान देते हैं और इस फिल्म में भी कुछ ऐसे दृश्य हैं जो इसे खास बनाते हैं. उदाहरण के लिए, एक दृश्य में हम देखते हैं कि एक व्यक्ति दूरबीन से देख रहा है और अगले ही पल खेतरपाल अपने टैंक के पेरिस्कोप से देख रहे हैं. ये दृश्य भावनात्मक रूप से बहुत प्रभाव डालता है.

फिल्म की शुरुआत थोड़ी धीमी और असंगत लगती है. फ्लैशबैक अचानक आते हैं और पहले हिस्से में खेतरपाल के प्रशिक्षण के दिन पूरी तरह असर नहीं छोड़ पाते. लेकिन फिल्म का दूसरा हिस्सा बहुत ज्यादा रोमांचक और भावनात्मक हो जाता है. इसका सबसे बड़ा कारण है धर्मेंद्र और जायदिप अहलावत की एक्टिंग. दोनों के बीच की दोस्ती और संवाद दिल को छू लेते हैं. 

इसके अलावा, ये फिल्म शोलाय के फेमस जेलर असरानी की आखिरी फिल्मों में से एक भी है. संगीत और बैकग्राउंड स्कोर (तनुज टीकू और केतन सोढ़ा) भावनाओं को और बढ़ा देते हैं. युद्ध के दृश्य भी बहुत रियल लगते हैं.

कलाकारों का प्रदर्शन

अगस्त्य नंदा की ये पहली फिल्म है. उनका दृश्य रूप और चेहरे का भाव किरदार के लिए सही हैं, लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज थोड़ी सीमित रहती है. अरुण का किरदार अपने चरमोत्कर्ष तक पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता. सिमर भाटिया, जो पहली बार एक्टिंग कर रही हैं, स्क्रीन पर बहुत सहज दिखती हैं. उनका किरदार धीरे-धीरे कहानी में जगह बनाता है और अच्छा प्रभाव छोड़ता है.

युद्ध के बाहर की सच्चाई

आज के समय में जब युद्ध और देशभक्ति को तेज और रंगीन अंदाज में दिखाया जाता है, इक्कीस थोड़ी अलग राह अपनाती है. फिल्म में विरोधी कमांडर का अरुण खेतरपाल के प्रति सम्मान दिखाना कुछ लोगों को अजीब लग सकता है. फिल्म ये भी याद दिलाती है कि युद्ध में सम्मान का मतलब देश का विश्वास नहीं होता.

इक्कीस तब सबसे प्रभावशाली होती है जब ये सिर्फ युद्ध की फिल्म बनने की कोशिश छोड़ देती है और हमें एक दुखद सच्चाई दिखाती है: हमारे स्वतंत्रता के अधिकार उन लोगों ने खरीदे, जिन्होंने खुद अपने जीवन का सुख कभी नहीं पाया. सिनेमाघर से आप गर्व से नहीं, बल्कि खालीपन और भावनात्मक भार के साथ बाहर आते हैं. यही फिल्म की सबसे बड़ी सफलता है ये दिल पर गहरी चोट करती है और याद दिलाती है कि असली नायक अक्सर हमें सिर्फ़ यादों में मिलते हैं.

 

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