बिहार चुनाव में जमकर हुई वोटिंग, दोनों फेज में टूट गए सारे रिकॉर्ड; जानें आखिर क्या हैं इसके पीछे का संकेत?

Bihar Election Second Phase Voting : दूसरे और अंतिम चरण का मतदान समाप्त हो गया है. 3.7 करोड़ से ज़्यादा मतदाताओं ने 122 सीटों पर 1,302 उम्मीदवारों के भाग्य का फ़ैसला ईवीएम में डालकर किया.

Published by Shubahm Srivastava

Bihar Election Second Phase Voting : बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण में 122 सीटों पर मतदान हुआ, जिसमें शाम 5 बजे तक रिकॉर्ड 67.14% वोटिंग दर्ज की गई. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार किशनगंज 76.26% मतदान के साथ शीर्ष पर रहा, जबकि कटिहार (75.23%), जमुई (67.81%) और बांका (68.91%) जैसे जिलों में भी उत्साहजनक वोटिंग देखी गई.

विशेषज्ञों का मानना है कि अंतिम आंकड़ा और बढ़ सकता है, जिससे बिहार का यह चुनाव आज़ादी के बाद का सबसे अधिक मतदान वाला चुनाव बन सकता है.

पहले चरण में भी हुई रिकॉर्ड वोटिंग

इस चरण में कुल 1,302 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें नीतीश कुमार सरकार के नौ मंत्री भी शामिल हैं. पहला चरण 8 नवंबर को संपन्न हुआ था, जिसमें 65% मतदान हुआ था. 1952 से अब तक बिहार में किसी भी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में इतना अधिक वोट प्रतिशत दर्ज नहीं हुआ है. तीन हजार से अधिक बूथों की रिपोर्ट अभी बाकी होने के कारण कुल प्रतिशत और बढ़ने की संभावना है.

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क्या कहता है बिहार का इतिहास?

ऐतिहासिक रूप से देखें तो बिहार में लोकसभा चुनाव में सबसे अधिक मतदान 1998 में 64.60% और विधानसभा चुनाव में 2000 में 62.57% रहा था. 2000 का चुनाव राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था, जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने लेकिन सात दिन में इस्तीफा देना पड़ा और राबड़ी देवी दोबारा सत्ता में आईं. तुलना करें तो 2024 के लोकसभा चुनाव में 56.28% और 2020 के विधानसभा चुनाव में 57.29% मतदान हुआ था.

क्या SIR है असल वजह?

इस बार का उच्च मतदान विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़ा भी माना जा रहा है, जिसमें 65 लाख फर्जी, डुप्लीकेट या निष्क्रिय वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए. इससे सक्रिय मतदाताओं का अनुपात बढ़ा और वास्तविक भागीदारी अधिक हुई.

वोटिंग प्रतिशत बढ़ने का क्या है संकेत?

हालांकि बड़ा सवाल यह है कि यह रिकॉर्ड वोटिंग सत्ता के समर्थन का संकेत है या सत्ता-विरोध का. बिहार के राजनीतिक इतिहास में वोट प्रतिशत और सत्ता परिवर्तन के बीच सीधा संबंध नहीं रहा है. लालू यादव के दौर में उच्च मतदान देखा गया, वहीं नीतीश कुमार कम वोटिंग में भी सरकार बनाते रहे. इसलिए इस बार की रिकॉर्ड वोटिंग नतीजों से पहले कोई स्पष्ट संकेत नहीं देती, पर यह तय है कि बिहार ने लोकतंत्र का नया उत्सव रच दिया है.

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