बिहार की धरती पर एक बार फिर राजनीति की तेज़ रफ्तार चल पड़ी है. 243 विधानसभा सीटों के इस राज्य‑चुनाव में सिर्फ पार्टियों का नहीं बल्कि नए वोटर‑संकेतों, युवा‑आदर्शों और सामाजिक बदलावों का भी संघर्ष दिख रहा है. आइए, देखें इस बार कौन‑सी दिशा में मजबूती दिख रही है, और एक सीमित AI‑मॉडल की भाषा में क्या अनुमान बनते हैं. आइए देखते हैं आखिर AI के विश्लेषण में इसबार NDA या महागठबंधन, किसके पास होगी बिहार की सत्ता?
1. मुख्य परिदृश्य
राजनीतिक समीकरण साफ नहीं हैं. National Democratic Alliance (NDA) को लंबे समय से सत्ता में रहने का लाभ है. संगठन‑शक्ति, नाम‑पहचान, बुनियादी कामों का दावा. वहीं Rashtriya Janata Dal (RJD)‑के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को “मुस्लिम‑यादव” वोट बैंक, युवा‑आवेदन, बदलाव‑आशा का समर्थन मिल रहा है. विभिन्न सर्वेक्षण बताते हैं कि NDA को थोड़ा बढ़त मिल रही है. लेकिन यह बढ़त “बहुमत” का आश्वासन नहीं देती.
2. बदलाव के संकेत
युवा एवं बेरोजगारी: बिहार में 15‑29 वर्ष आयु‑वर्ग के बीच बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है. युवा‑वोटर इसी से जुड़े मुद्दों पर उत्सुक हैं. जात‑प्राथमिकताएँ और गठबंधन: राज्य की आबादी में EBCs + OBCs करीब 60 % से अधिक हैं, जो राजनीतिक दृश्यों को बदलने वाला पृष्ठभूमि तैयार करते हैं. महिला मतदाता & विकासवाद: यह भी देखा गया है कि महिलाओं‑वोटरों पर विशेष फोकस है, और सड़क‑मेट्रो‑उपकरण जैसे विकास‑प्रोजेक्ट्स राजनीतिक वादे बने हुए हैं.
3. AI‑अनुमान की ओर
अगर हम एक सरल लेकिन रीयल‑वर्ल्ड डेटा‑मूलक AI‑मॉडल का आधार मानें, जिसमें पिछले वोट शेयर, गठबंधन‑स्विच, सामाजिक विभाजन, मुद्दे‑प्रभाव शामिल हों तो निम्न तस्वीर उभरती है:
- NDA को 48‑52% वोट‑शेयर की संभावना दिखती है, जो इसे सबसे बड़े गठबंधन के रूप में बना सकती है।
- विपक्षी गठबंधन (RJD‑गठबंधन) को 35‑40% वोट‑शेयर मिल सकती है. स्थिर समर्थन मिलेगा लेकिन “सिंगल ब्लॉक” में शीर्ष पर आने की चुनौती होगी.
- सीटों की गणना में: NDA 120‑150 सीटें तक पहुँच सकती है; विपक्ष, 70‑110 सीटें तय कर सकती है.
- लेकिन “स्वतंत्र बहुमत” (122 + सीटें) की दिशा में बहुत बड़ी गांरटी नहीं बनती. विशेष रूप से यदि छोटे दलों और स्थानीय उम्मीदवारों ने दिशानिर्देशन बदल दिया.
- कभी‑कभी एक तिहाई‑खुला परिणाम भी संभव है, जहाँ एक बड़े दल को पूरी बहुमत मिलना नहीं‑मिलना तय हो.
4. क्यों ये अनुमान इतना बड़ा नहीं है?
सामाजिक समीकरण बदल रहे हैं: जात‑वर्ग, क्षेत्र‑विशेष, युवा‑वोटर की प्राथमिकताएँ. सब में “रुझान परिवर्तन” दिख रहा है.
गठबंधन‑दलित उतनी स्थिरता नहीं दिखा रहे जितनी पहले थी: सीट बंटवारे, नेतृत्व पर असमंजस सामने आ रहा है.
“विकास” और “वादा” के बीच फर्क है. वोटर अब सिर्फ नाम‑परिचय से नहीं बल्कि “काम की गति” से प्रभावित हो रहे हैं.
छोटे दल और क्षेत्रीय उम्मीदवारों का असर बढ़ा है. वे “कीमेकर” बन सकते हैं यदि बड़े गठबंधन टूट जाएँ.
इस चुनाव में “कौन जीत रहा है” से बढ़ कर सवाल है. “कैसे जीत रहा है” और “कितनी मजबूती के साथ जीत रहा है”. मेरा निजी अनुमान (AI‑तकनीक नहीं बल्कि डेटा‑विश्लेषण की समझ से) यह है कि NDA इस बार अग्रणी गठबंधन के रूप में सामने आएगा, लेकिन शायद वह अपनी मरम्मत‑मुल्क बहुमत‑स्थिति को सहजता से नहीं दोहरा पाएगा. विपक्षी गठबंधन ने “चेंज” की भाषा पकड़ी है, और यदि वह सोशल मूवमेंट‑स्तर पर सफाई से काम करे, तो उलट मोड़ ला सकता है.

