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च्यवनप्राश से करोड़ों की ज़मीन तक: रामदेव के पतंजलि मॉडल का दूसरा चेहरा

महेंद्रगढ़ में 1965 में जन्मे रामकिशन को जब जींद के गुरुकुल कालवा भेजा गया, तो उनके गुरु आचार्य बलदेव ने ही उन्हें “रामदेव” नाम दिया. वहीं उनकी मुलाकात बालकृष्ण से हुई, जो आगे चलकर उनकी आर्थिक और व्यावसायिक दुनिया का स्तंभ बना.

Published by Hasnain Alam

बाबा रामदेव की कहानी केवल “योग से सफलता” की कहानी मान लेना, शायद इस युग की सबसे बड़ी भूलों में से एक होगी. यह कथा न सिर्फ एक व्यक्ति की मेहनत की, बल्कि उस दौर की भी है, जब टीवी का जादू धर्म के रास्ते से घर-घर में दाख़िल हो रहा था. 90 के दशक के हरिद्वार की गलियों में दो नौजवान- रामदेव और बालकृष्ण- साइकिल पर चवनप्राश बेचते नज़र आते थे.

गरीबी इतनी थी कि कभी बोरी कंधे पर डालनी पड़ती, कभी उधार का सामान लौटाने के लिए गलियों का चक्कर लगाना पड़ता. लेकिन, उसी हरिद्वार की धूल से 2000 के दशक में एक ऐसा “ब्रांड” जन्म लेने वाला था जो जल्द ही भारत के हर रसोईघर, हर टीवी स्क्रीन और हर राजनीतिक मंच तक पहुंच जाएगा.

हरिद्वार के गुरुकुल से शुरू हुई यह यात्रा बहुत पुरानी थी. महेंद्रगढ़ के सैयद अलीपुर गांव में 1965 में जन्मे रामकिशन को जब जींद के गुरुकुल कालवा भेजा गया, तो उनके गुरु आचार्य बलदेव ने ही उन्हें “रामदेव” नाम दिया. वहीं उनकी मुलाकात बालकृष्ण से हुई नेपाल मूल के उस युवा से, जो आगे चलकर उनकी आर्थिक और व्यावसायिक दुनिया का स्तंभ बना.

तीसरा नाम इस यात्रा में जुड़ा, स्वामी कर्मवीर का. योग को विज्ञान की तरह पढ़ने वाले कर्मवीर के पास एक विज़न था कि योग केवल ध्यान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामूहिक जागरण का जरिया है. यहीं से शुरू हुई दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट की नींव, 1995 में. एक टिन-शेड के नीचे दिव्य फार्मेसी की स्थापना हुई, जहां आयुर्वेदिक दवाइयां बनतीं और साइकिल पर बेचने के लिए निकलतीं. वही दिव्य फार्मेसी आगे चलकर “पतंजलि” की जननी बनी.

लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती, बल्कि यहीं से मोड़ लेती है. क्योंकि जैसे-जैसे योग शिविरों में भीड़ बढ़ती गई, पैसे की गिनती भी बढ़ने लगी. आचार्य कर्मवीर, जिनके साथ से यह यात्रा शुरू हुई थी, उन्हें महसूस हुआ कि सन्यास के आदर्श धीरे-धीरे व्यवसाय के दबाव में खो रहे हैं. रामदेव के परिवार के सदस्य आश्रम के कामकाज में शामिल हो चुके थे. सन्यास का जो पहला नियम था – परिवार और धन का त्याग- वह अब उलट कर परिवार और धन की वापसी में बदल चुका था.

2005 में जब देश होली मना रहा था, उसी दिन कर्मवीर बिना कुछ कहे कृपालु आश्रम छोड़कर चले गए- सदा के लिए और इसके बाद जो हुआ, उसने बाबा रामदेव को योगगुरु से उद्योगपति बना दिया.  2005 में दिव्य फार्मेसी पर सेल्स टैक्स चोरी के आरोप लगे.

तहलका मैगज़ीन की रिपोर्ट के मुताबिक उस साल मात्र ₹67,000 की सेल्स दिखाई गई थी, जबकि डाकघरों से निकले पार्सल बताते थे कि कारोबार कई लाखों का था. छापेमारी हुई, अधिकारियों पर दबाव पड़ा, और फिर वही पुराना भारतीय किस्सा- मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ गया.

उधर मजदूरों के विरोध, वृंदा करात का आंदोलन, और दवाइयों में हड्डी के इस्तेमाल जैसे विवादों ने बाबा को पहली बार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया. लेकिन हर विवाद ने, हर आलोचना ने, बाबा को और लोकप्रिय बना दिया. रामदेव अब सिर्फ योगगुरु नहीं रहे- वे “नेता” भी बन चुके थे, भले ही उन्होंने राजनीति में औपचारिक प्रवेश न किया हो.

2006 में पतंजलि आयुर्वेद की शुरुआत हुई. 90% हिस्सेदारी बालकृष्ण की और 10% मुक्तानंद की. साथ ही वैदिक ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड के ज़रिए आस्था और संस्कार जैसे चैनलों का अधिग्रहण – मीडिया की भाषा में कहें तो “कंटेंट और प्लेटफॉर्म दोनों अपने”. लेकिन, उसी साल एक और घटना हुई जिसने इस कहानी में रहस्य का रंग भर दिया – गुरु शंकरदेव का लापता होना. 14 जुलाई 2007 को वे हरिद्वार से टहलने निकले और फिर कभी नहीं लौटे. मामला आज तक अनसुलझा है.

आने वाले सालों में रामदेव का सफर राजनीति की गलियों तक पहुंचा. रामलीला मैदान में काले धन के खिलाफ आंदोलन, कांग्रेस पर हमले, और धीरे-धीरे सत्ता के गलियारों में प्रवेश. यह वही व्यक्ति था जो कभी चवनप्राश साइकिल पर बेचता था और अब जिसके शब्द से बाज़ार हिलता था, सरकारें चौकन्नी हो जाती थीं.

इसके साथ ही आचार्य बालकृष्ण की कहानी सिर्फ एक कारोबारी सफलता की दास्तान नहीं है, बल्कि उस भारतीय स्वप्न का प्रतीक है जो योग, स्वदेशी और बाज़ार- तीनों को एक सूत्र में बांध देता है. कभी बाबा रामदेव के सहयोगी के रूप में छाया में खड़े रहने वाले बालकृष्ण आज उस साम्राज्य के आर्थिक स्तंभ हैं, जिसने पतंजलि को एक घरेलू नाम बना दिया.

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फोर्ब्स के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2012 से मार्च 2016 तक महज़ चार वर्षों में पतंजलि का रेवेन्यू दस गुना उछल गया और 758 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया. यह वही समय था जब बाकी कंपनियां 10 प्रतिशत की वृद्धि के लिए संघर्ष कर रही थीं, लेकिन पतंजलि हर साल 100 प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. यह एक असाधारण छलांग थी जिसने बालकृष्ण को भारत के नए अरबपतियों की सूची में पहुंचा दिया.

पत्रकार कौशिक डेका की किताब The Baba Ramdev Phenomenon बताती है कि साल 2009 में पतंजलि का कारोबार सिर्फ ₹13 करोड़ का था, जो 2010 में ₹317 करोड़, 2011 में ₹450 करोड़, 2012 में ₹849 करोड़, 2013 में ₹1191 करोड़, 2014 में ₹2166 करोड़ और 2015 में ₹5000 करोड़ तक पहुंच गया.

साल 2022 आते-आते यह आंकड़ा ₹45,000 करोड़ को पार कर गया. बीच में एकाध साल छोड़ दें, तो हर साल पतंजलि की कमाई लगभग दोगुनी होती रही. यह किसी सामान्य ग्रोथ का नतीजा नहीं था-  यह उस सामाजिक-आर्थिक ताकत का प्रतिबिंब था जो योग और स्वदेशी के नाम पर खड़ी की गई थी.

इस सफलता की चमक के पीछे कुछ धुंधले सवाल भी खड़े होते हैं. रामदेव और बालकृष्ण के पतंजलि ग्रुप पर समय-समय पर गड़बड़झाले के आरोप लगते रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि मसूरी में मौजूद जॉर्ज एवरेस्ट स्टेट – जो 1832 में भारत के सर्वेयर जनरल सर जॉर्ज एवरेस्ट द्वारा बनवाया गया एक ऐतिहासिक स्थल है-  कैसे एक विवादित सौदे का हिस्सा बना.

उत्तराखंड सरकार ने इस हेरिटेज साइट को एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए एशियन डेवलपमेंट बैंक से ₹23.5 करोड़ का कर्ज लिया था. दिसंबर 2022 में, राज्य के टूरिज़्म बोर्ड ने यहां एडवेंचर टूरिज़्म को बढ़ावा देने के लिए टेंडर जारी किया. शर्त साफ़ थी – नीलामी में हिस्सा लेने वाली कंपनियों के बीच कोई संबंध नहीं होना चाहिए. यह प्रोजेक्ट 122 एकड़ भूमि, पार्किंग, पाथवे, हेलीपैड, लकड़ी के कॉटेज, कैफे, दो म्यूज़ियम और एक ऑब्ज़र्वेटरी को शामिल करता था, जिसे 15 साल के लिए किराए पर देने की योजना थी.

नीलामी में तीन कंपनियां उतरीं: प्रकृति ऑर्गेनिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, भरवा एग्री साइंस प्राइवेट लिमिटेड और राजस एरोस्पोर्ट्स एंड एडवेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड. पहली ने ₹51 लाख, दूसरी ने ₹65 लाख और तीसरी ने ₹1 करोड़ की सालाना कंसेशन फीस की बोली लगाई. टेंडर राजस एरोस्पोर्ट्स को मिल गया.

जब इन तीनों कंपनियों की मालिकी की पड़ताल हुई, तो कहानी का स्वर बदल गया. रिकॉर्ड्स से सामने आया कि तीनों कंपनियों का सीधा संबंध एक ही व्यक्ति से है, आचार्य बालकृष्ण से. प्रकृति ऑर्गेनिक्स और भरवा एग्री साइंस में बालकृष्ण की 99% हिस्सेदारी है, जबकि राजस एरोस्पोर्ट्स में टेंडर के समय उनकी 25% हिस्सेदारी थी, जो कुछ महीनों में 70% तक बढ़ गई.

यानी तीनों कंपनियां एक ही समूह से जुड़ी थीं, लेकिन टेंडर प्रक्रिया को उसी तरह आगे बढ़ाया गया मानो सब कुछ नियम के मुताबिक हुआ हो. सरकारी अधिकारियों ने यह कहते हुए इसे स्वीकार कर लिया कि इसमें कोई “समस्या” नहीं है. इस तरह बालकृष्ण को यह प्रोजेक्ट ₹1 करोड़ सालाना किराए पर 15 साल के लिए दे दिया गया. यानी 15 साल में सरकार को कुल ₹15 करोड़ मिलेंगे जबकि विकास पर खुद सरकार ने ₹23.5 करोड़ खर्च किए थे.

इस पूरे प्रकरण ने यह सवाल उठाया कि जब सार्वजनिक संसाधन निजी हितों की तरफ झुकने लगते हैं, तो योग और स्वदेशी के नाम पर खड़ा यह आर्थिक साम्राज्य आखिर किस दिशा में जा रहा है. एक तरफ वह छवि है जो बालकृष्ण को साइकिल पर च्यवनप्राश बेचने वाले युवक से अरबपति उद्योगपति तक पहुंचाती है, दूसरी तरफ वह सच्चाई है जिसमें सत्ता और व्यापार का गठजोड़ किसी पुरानी कहानी की तरह दोहराया जा रहा है.

आज बालकृष्ण और रामदेव के पास हरिद्वार से लेकर देशभर में हजारों एकड़ ज़मीन है. उनके आर्थिक साम्राज्य की जड़ें अब योग की गुफाओं से निकलकर नीति और नौकरशाही की गलियों तक पहुंच चुकी हैं.

Hasnain Alam
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