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Digambara Jain monks: दिगंबर जैन मुनि कपड़े क्यों नहीं पहनते? जानिए इसके पीछे का आध्यात्मिक कारण

Digambara Jain monks: दिगंबर जैन मुनि कपड़े नहीं पहनते क्योंकि यह उनके लिए पूर्ण त्याग, अपरिग्रह, अहिंसा और आत्मनियंत्रण का प्रतीक है. वे किसी भी भौतिक वस्तु से जुड़ाव नहीं रखना चाहते और सूक्ष्म जीवों की रक्षा के लिए भी कपड़ों का त्याग करते हैं. यह जीवनशैली उन्हें ‘यथाजात रूप’ में रखते हुए मोक्ष की ओर अग्रसर करती है.

By: Ranjana Sharma | Last Updated: April 1, 2026 10:32:23 PM IST



Digambara Jain monks: दुनियाभर में जैन धर्म अपनी कठिन तपस्या, सख्त अनुशासन और अहिंसा के सिद्धांतों के लिए जाना जाता है. अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि दिगंबर जैन मुनि बिना कपड़ों के क्यों रहते हैं, चाहे मौसम कैसा भी हो. इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक कारण छिपा है.

‘दिगंबर’ शब्द का अर्थ और दर्शन

‘दिगंबर’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है-‘दिक्’ यानी दिशा और ‘अंबर’ यानी वस्त्र. इसका अर्थ है कि जिनके लिए चारों दिशाएं ही उनका वस्त्र हैं. दिगंबर मुनि प्रकृति और आकाश को ही अपना पहनावा मानते हैं और किसी भौतिक वस्त्र पर निर्भर नहीं रहते.

अपरिग्रह का सिद्धांत: त्याग ही मार्ग

जैन धर्म में अपरिग्रह का विशेष महत्व है, जिसका अर्थ है किसी भी वस्तु का संग्रह न करना. मुनि पूरी तरह त्याग का जीवन अपनाते हैं. उनका मानना है कि कपड़े पहनने से उनके प्रति लगाव और देखभाल की चिंता पैदा होती है, जो साधना में बाधा बन सकती है. इसलिए वे कपड़ों का त्याग कर देते हैं.

अहिंसा का पालन: सूक्ष्म जीवों की रक्षा

जैन मुनि अहिंसा का अत्यंत कठोरता से पालन करते हैं. उनका मानना है कि कपड़ों में नमी या गंदगी से सूक्ष्म जीव उत्पन्न हो सकते हैं. कपड़ों को धोने या झाड़ने से इन जीवों को नुकसान पहुंच सकता है. इसी कारण वे कपड़े न पहनकर किसी भी प्रकार की जीव-हत्या से बचने का प्रयास करते हैं.

संयम और आत्मनियंत्रण का प्रतीक

बिना कपड़ों के रहना केवल त्याग नहीं, बल्कि मन और शरीर पर पूर्ण नियंत्रण का प्रतीक है. दिगंबर मुनि कठोर मौसम—चाहे तेज गर्मी हो या कड़ाके की ठंड-में भी संतुलित रहते हैं. यह उनकी साधना और मानसिक शक्ति को दर्शाता है. जैन शास्त्रों के अनुसार, मोक्ष प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को वैसा ही सरल और निष्कपट बनना चाहिए जैसा वह जन्म के समय होता है. इसे ‘यथाजात रूप’ कहा जाता है. दिगंबर मुनि इसी अवस्था को अपनाकर संसारिक बंधनों से मुक्त रहने का प्रयास करते हैं.

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