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झूठा रेप केस औऱ अंतिम संस्कार…सिस्टम ने छीन लिए विष्णु तिवारी के 20 साल! अब सोशल मीडिया पर मिल रहा लोगों का साथ; जानें क्या है पूरा मामला?

false imprisonment Case: इस मामले की शुरुआत सितंबर 2000 में हुई, जब उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के रहने वाले विष्णु तिवारी को रेप और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया.

Published by Shubahm Srivastava
Vishnu Tiwari Case: यह कहानी विष्णु तिवारी की है, जो भारत की न्याय व्यवस्था में हुई एक गंभीर चूक और उसके मानवीय असर को उजागर करती है. विष्णु तिवारी 2021 में जब जेल से बाहर आए, तो आज़ादी उनके लिए खुशी नहीं बल्कि टूटन लेकर आई. उन्होंने एक ऐसे अपराध के लिए करीब 20 साल जेल में बिताए, जो उन्होंने किया ही नहीं था. इन दो दशकों में उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी—माता-पिता और दो भाई दुनिया छोड़ चुके थे, परिवार बिखर गया था, समाज ने उन्हें अलग-थलग कर दिया था और उनकी ज़मीन तक बिक चुकी थी. जिस दुनिया को वे जानते थे, वह अब मौजूद नहीं थी.

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेज़ी से वायरल हुआ, जिसमें एक व्यक्ति जेल से रिहा होते समय फूट-फूटकर रोता दिख रहा है. 2021 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें एक झूठे रेप केस में 20 साल जेल में बिताने के बाद बरी किया था. फिलहाल इस वीडियो की सत्यता की पुष्टि नहीं हो पाई है.

क्या है पूरा मामला?

इस मामले की शुरुआत सितंबर 2000 में हुई, जब उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के रहने वाले विष्णु तिवारी को रेप और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया. उस समय उनकी उम्र केवल 23 साल थी. 2003 में एक ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए आगरा सेंट्रल जेल में उम्रकैद की सज़ा सुना दी. इसके बाद वे लगातार जेल में रहे—उन्हें न ज़मानत मिली, न पैरोल, यहाँ तक कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी, जब जेलों की भीड़ कम करने के लिए कई कैदियों को रिहा किया गया था.

माता-पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने तक की नहीं मिली अनुमति

इन 20 वर्षों में विष्णु को अपने माता-पिता और भाइयों के अंतिम संस्कार में शामिल होने तक की अनुमति नहीं मिली. उनका परिवार सामाजिक बहिष्कार का शिकार हुआ और आर्थिक रूप से भी तबाह हो गया. जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने कहा था कि वे खुश तो हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता कि आगे क्या करें. उनका घर खंडहर बन चुका है और जीवन की सारी नींव ढह चुकी है. उन्होंने आरोप लगाया कि जांच अधिकारी ने झूठी रिपोर्ट दी और उनके वकील ने भी उन्हें धोखा दिया. उनके अनुसार, पूरा विवाद गाय बांधने को लेकर हुए झगड़े से शुरू हुआ था.


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सोशल मीडिया पर विष्णु को मिल रहा यूजर्स का साथ

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और विष्णु की कहानी ने लोगों में गुस्सा, दुख और निराशा पैदा की है. कई यूज़र्स ने सरकार से मुआवज़े की मांग की और झूठा आरोप लगाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही. कुछ ने न्याय व्यवस्था और पुलिस को जवाबदेह ठहराने की मांग की, जबकि कई टिप्पणियाँ सिस्टम की निष्पक्षता पर सवाल उठाती दिखीं.

कुछ इस तरह जेल से बाहर आए विष्णु तिवारी

इस मामले में बड़ा मोड़ 2019 में आया, जब जेल अधिकारियों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से संपर्क किया. तब कानूनी सहायता वकील श्वेता सिंह राणा को विष्णु तिवारी का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया. उनकी अपील करीब 16 साल तक “डिफेक्टिव” पड़ी रही, यानी फाइलिंग की खामियों के कारण उस पर सुनवाई ही नहीं हो सकी. पेपरबुक तैयार होने और मामले की गहराई से जांच के बाद, जस्टिस कौशल जयेंद्र ठाकर और जस्टिस गौतम चौधरी की डिवीजन बेंच ने 2021 में विष्णु तिवारी को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
Shubahm Srivastava

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