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Kapil Dev Success Story: दो रोटी और बेइज्जती ने कपिल की बदल दी किस्मत, पहली पर की ऐसी बॉलिंग उड़ गया पाकिस्तानी बल्लेबाज का हेलमेट

Kapil Dev Success Story: यह कहानी एक 15 साल के लड़के की है, जो राष्ट्रीय क्रिकेट कैंप में पूरे दिन तेज गेंदबाजी करने के बाद भूखा था और उसने बस एक रोटी और माँगी थी.

Published by Heena Khan

Kapil Dev Success Story: यह कहानी एक 15 साल के लड़के की है, जो राष्ट्रीय क्रिकेट कैंप में पूरे दिन तेज गेंदबाजी करने के बाद भूखा था और उसने बस एक रोटी और माँगी थी. लेकिन उसे रोटी की जगह एक बात सुनने को मिलीकैंप के अधिकारी केकी तारापोर ने हँसते हुए कहा, “भारत में कोई तेज़ गेंदबाज़ नहीं होते.” यह बात मज़ाक में कही गई थी, लेकिन उस लड़के के दिल में गहराई तक उतर गई. वह लड़का चंडीगढ़ से आया था, उसने कोई बहस नहीं की, चुपचाप अपनी दो रोटियाँ खाईं और कमरे में लौट गया. उसी पल उसने मन में ठान लिया कि वह वही तेज़ गेंदबाज़ बनेगा, जो लोग कहते हैं कि भारत में नहीं होताऔर आगे चलकर उसी सोच ने भारतीय क्रिकेट का इतिहास बदल दिया.

वो खाना जिसने कपिल देव नाम के एक दिग्गज को बनाया

यह सत्तर के दशक के बीच की बात है. कपिल देव निखंज अंडर-19 कैंप के लिए बॉम्बे गए थे. ट्रेनिंग बहुत मुश्किल थी. लेकिन खाना नहीं. लंच में दो रोटी और कुछ सब्ज़ी. एक टीनएजर के लिए जिसका शरीर ही उसका एकमात्र हथियार था, यह काफी नहीं था. जब उसने विरोध किया, तो तारापोर के शब्द एक थप्पड़ की तरह लगे. इसलिए नहीं कि वे क्रूर थे, बल्कि इसलिए कि वो ही सच था जो तारापोर ने बोला था. आज़ादी के बाद से भारत ने कोई असली तेज़ गेंदबाज़ पैदा नहीं किया था. मोहम्मद निसार और अमर सिंह 1930 के दशक में खेले थे, लेकिन बस वही थे. सिस्टम स्पिन के लिए बनाया गया था. तेज़ गेंदबाज़ सिर्फ़ ऐसे लोग थे जो गेंद की चमक हटाने के लिए तीन ओवर फेंकते थे. बाद में कपिल ने कहा कि उन्हें गुस्सा नहीं आया, सिर्फ़ आभार महसूस हुआ. तारापोर ने उन्हें रास्ता दिखाया था. उन्हें गलत साबित करना था. यही प्रेरणा थी. दो साल के अंदर ही उन्होंने भारत के लिए खेलना शुरू कर दिया.

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ऐसे बने कपिल

कपिल से पहले, भारतीय क्रिकेट सुनील गावस्कर की टेक्निकल काबिलियत और स्पिन चौकड़ी की चालाकी पर निर्भर था. जबकि गावस्करलिटिल मास्टर” थे जो टेस्ट बचाने के लिए दिनों तक बैटिंग कर सकते थे, भारत में तेज़ गेंदबाज़ी की कमी थी. कपिल देव उस पहेली का गुमशुदा हिस्सा बन गए. अक्टूबर 1978. फैसलाबाद. 17 साल बाद पाकिस्तान बनाम भारत. यह सीरीज़ दोस्ती के बारे में होनी थी. पिचें सपाट थीं. दोनों टीमों में सुपरस्टार थे. भारत के लिए प्लान सिंपल था. ऑलराउंडर्स को गेंद की चमक उतारने दो. फिर बेदी, चंद्रशेखर और प्रसन्ना को स्पिन का जाल बुनने दो. कपिल 19 साल के थे. वो अलग दिखते थे. चौड़े कंधे. घनी मूंछें. आँखों में आग. वो ऐसे दौड़कर आए जैसे उन्हें कहीं जल्दी पहुँचना हो. मुश्ताक मोहम्मद ने टॉस जीता. माजिद खान और सादिक मोहम्मद ने ओपनिंग की. उन्हें हल्की स्विंग की उम्मीद थी, युद्ध की नहीं. कपिल के दूसरे ओवर ने सब कुछ बदल दिया. गेंद तेज़ी से ऊपर उठी. सादिक की टोपी से कुछ इंच दूर से गुज़री. सादिक हैरान रह गए. फिर डर गए. उन्होंने ड्रेसिंग रूम की ओर इशारा किया. उन्हें हेलमेट चाहिए था.

एक हेलमेट जिसने बात साबित कर दी

यह 1978 की बात है. हेलमेट वेस्ट इंडीज के तेज़ गेंदबाज़ों का सामना करने वाले बल्लेबाज़ों के लिए थे. उन भारतीयों के लिए जिन्हें चार्ली ग्रिफिथ और माइकल होल्डिंग की गेंदें लगी थीं. किसी भारतीय गेंदबाज़ का सामना करने वाले पाकिस्तानी के लिए नहीं. अब वो एक टीनएजर से सुरक्षा मांग रहा था. हेलमेट आने में कई ओवर लग गए. जब ​​हेलमेट आया, तो कपिल ने बिल्कुल भी देर नहीं की. अगली बाउंसर हेलमेट पर लगी. गेंद चार लेग-बाय के लिए बाउंड्री के पार चली गई. कपिल देव ने खुद को साबित कर दिया था.

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