पितृपक्ष को लेकर न रखने मन में कोई भी संशय, पितरों को दें जलांजलि और करें पिंडदान, जानिए प्रभु श्री राम ने कैसे पिता की मृत्यु पर क्या किया

PITRU PAKSHA त्रिकालदर्शी भगवान वाल्मीकि ने अपनी कृति रामायण में विस्तार से उल्लेख किया है किस तरह अपने अनुज लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वनगमन करते समय चित्रकूट में भरत से अपने पिता के निधन की सूचना मिली और फिर उन्होंने किस तरह उनका तर्पण किया

PITRU PAKSHA 2025: पितृपक्ष को लेकर लोगों के मन में संशय रहता है कि कैसे करें और क्या करें, किस आचार्य के सानिध्य में अपने पितरों को जलांजलि दें और उनके द्वारा कैसे पिंडदान करें। त्रिकालदर्शी भगवान वाल्मीकि ने अपनी कृति रामायण में इस प्रसंग का विस्तार से उल्लेख किया है कि किस तरह अपने अनुज लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वनगमन करते समय चित्रकूट में भरत से अपने पिता के निधन की सूचना मिली और फिर उन्होंने किस तरह उनका तर्पण किया,तो चलिए जानते हैं Pandit Shashi Shekhar Tripathi द्वारा। 

पिता की मृत्यु के समाचार से अचेत हुए श्री राम

पिता के आदेश से 14 वर्षों के लिए वन में गए अयोध्यापुरी के नरेश महाराजा दशरथ की मृत्यु का समाचार उन्हें चित्रकूट की धरती पर महामुनि भरत ने दिया तो श्री राम शोक से व्याकुल हो विलाप करने लगे। वाल्मीकि कृत रामायण में लिखा है इतनी हृदय विदारक बात सुन श्री राम भी अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। उन्हें इस अवस्था में देख वन में उनके साथ गयी पत्नी सीता और लक्ष्मण सहित भरत भी उन्हें घेर कर खड़े हो गए और चारो लोग रोने लगे। कुछ देर बाद उनकी चेतना लौटी तो सामान्य होते हुए इस बात का दुख व्यक्त किया कि पिता के ज्येष्ठ पुत्र होने के बाद भी वे पिता का अंतिम संस्कार नहीं कर सके। 

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पत्नी और भाई के साथ इस तरह दें जलांजलि

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में अयोध्या कांड के 103 वें सर्ग में कहा गया है कि श्री राम ने सीता और लक्ष्मण से कहा कि अंतिम संस्कार में भले ही न शामिल हो सके हों किंतु अब जलांजलि तो देंगे ही। मंदाकिनी नदी तक जाने के लिए सबसे आगे सीता, उनके पीछे लक्ष्मण और फिर वे स्वयं चले और बोले कि शोक के समय की यही परिपाटी है। नदी में पहुंचने के बाद श्री राम ने अपनी अंजुरी में जल भर कर दक्षिण दिशा की ओर मुख कर बोले, पिताजी ! यह जल आपकी सेवा में उपस्थित हो। मेरे पूज्य पिता राज शिरोमणि महाराज दशरथ, आज मेरा दिया हुआ यह जल पितृलोक में गए हुए आपको अक्षय रूप में प्राप्त हो। इसके बाद उन्होंने पवित्र मंदाकिनी नदी से निकल कर किनारे पर आकर अपने भाईयों के साथ मिल कर पिंडदान किया। 

जो अन्न खाते हैं उसी से पिंड बना करें दान

अब जंगल में जौ का आटा और तिल आदि तो उपलब्ध नहीं था इसलिए उन्होंने पहले ही अपने भाई से कह कर जंगल में बहुतायत में होने वाले झाड़ी दार पेड़ इंगुदी के फल को मंगा लिया । इसी फल के गूदे में बेर को मिला कर उसका पिंड बनाया और बिछे हुए कुशा पर रख कर दुख में रोते हुए बोले, महाराज ! प्रसन्नता पूर्वक यह भोजन स्वीकार कीजिए क्योंकि आजकल यही हम लोगों का आहार है। मनुष्य जो अन्न स्वयं खाता है वही उसके देवता भी ग्रहण करते हैं।   

Pandit Shashishekhar Tripathi

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