Sree Devi Temple: भारत के इस मंदिर में पुरुष पहनते हैं साड़ी और करते हैं श्रृंगार, तब मिलता है पूजा का अधिकार
Kottankulangara Sridevi Temple: सुप्रीम कोर्ट में चली सुनवाई के दौरान केरल के कोट्टांकुलंगारा श्रीदेवी मंदिर की अनोखी परंपरा चर्चा में आई, जहां हर साल “चमयविलक्कु” उत्सव में पुरुष सोलह श्रृंगार कर देवी की पूजा करते हैं. यह परंपरा आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक मानी जाती है.
Kottankulangara Sridevi Temple: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई के दौरान देशभर के मंदिरों की परंपराओं पर गहन चर्चा हुई. इसी बहस के बीच केरल के एक ऐसे मंदिर की परंपरा सामने आई, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. यहां हर साल एक विशेष उत्सव में पुरुष न सिर्फ महिलाओं के वस्त्र धारण करते हैं, बल्कि सोलह श्रृंगार कर देवी की भक्ति में लीन हो जाते हैं. यह परंपरा आस्था, विश्वास और सांस्कृतिक विरासत का अनोखा संगम मानी जाती है.
यह खास परंपरा कोट्टनकुलारा श्री देवी मंदिर से जुड़ी है, जो केरल के कोल्लम जिले के चंवारा गांव में स्थित है. यह मंदिर अपने वार्षिक “चमयविलक्कु” उत्सव के लिए प्रसिद्ध है. हर साल मलयालम कैलेंडर के मीनम महीने में आयोजित होने वाले इस उत्सव में हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं.
जब पुरुष करते हैं सोलह श्रृंगार
इस उत्सव की सबसे खास बात “चमयविलक्कु” अनुष्ठान है. इसमें पुरुष साड़ी या पारंपरिक स्त्री वेश धारण करते हैं और पूरी तरह सोलह श्रृंगार कर हाथों में दीप लेकर शोभायात्रा में शामिल होते हैं. पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर निकलने वाली यह यात्रा बेहद रंगीन और आकर्षक होती है, जिसमें भक्ति के साथ-साथ सांस्कृतिक विविधता भी झलकती है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत एक चमत्कारी घटना से जुड़ी है. कहा जाता है कि कुछ ग्वालों ने एक पत्थर पर नारियल तोड़ा, जिससे खून निकलने लगा. इसे देवी की उपस्थिति का संकेत माना गया और वहीं मंदिर की स्थापना हुई. शुरुआत में युवतियां यहां पूजा करती थीं, लेकिन बाद में पुरुषों ने भी स्त्री वेश में पूजा करना शुरू किया, जो आगे चलकर इस अनोखे उत्सव का रूप बन गया.
यह उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है. करीब 25 हजार से अधिक लोग इसमें शामिल होते हैं, जिनमें विभिन्न समुदायों के श्रद्धालु भी होते हैं. 16 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में “चमयविलक्कु” के साथ-साथ अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं. श्रद्धालुओं का मानना है कि इस अनुष्ठान में भाग लेने से उन्हें देवी का आशीर्वाद मिलता है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं.