Legal Hindu Marriage: सुप्रीम कोर्ट ने 19 अप्रैल 2024 को एक अहम फैसला देते हुए ये साफ कर दिया कि सिर्फ शादी का रजिस्ट्रेशन (मैरिज सर्टिफिकेट) होने से हिंदू पति-पत्नी का कानूनी रिश्ता नहीं बनता, जब तक कि हिंदू शादी के जरूरी धार्मिक संस्कार वास्तव में किए न जाएं. अदालत ने कहा कि बिना रीति-रिवाज और रस्मों के की गई शादी कानून की नजर में मान्य नहीं है. ये फैसला डॉली रानी बनाम मनीष कुमार चंचल मामले में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दिया.
क्या था मामला?
इस मामले में महिला और पुरुष दोनों पेशे से कमर्शियल पायलट थे. दोनों की सगाई 7 मार्च 2021 को हुई थी. इसके बाद उन्होंने पारंपरिक हिंदू शादी करने के बजाय 7 जुलाई 2021 को एक निजी संस्था से विवाह प्रमाण पत्र प्राप्त कर लिया. इसी आधार पर उत्तर प्रदेश में विवाह का सरकारी रजिस्ट्रेशन भी करा लिया गया.
परिवारों द्वारा तय किया गया वास्तविक विवाह समारोह बाद में 25 अक्टूबर 2022 को होना था. लेकिन उससे पहले ही दोनों के बीच गंभीर मतभेद पैदा हो गए.
विवाद और कानूनी कार्यवाही
महिला ने पुरुष और उसके परिवार पर दहेज मांगने के आरोप लगाए और नवंबर 2022 में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई. इसमें भारतीय दंड संहिता की कई धाराएं और दहेज प्रतिषेध अधिनियम शामिल थे.
इसके बाद मार्च 2023 में पुरुष ने बिहार के मुजफ्फरपुर फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दायर की. महिला ने इस तलाक मामले को रांची स्थानांतरित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
दोनों पक्षों का अनुरोध
मामला लंबित रहते हुए दोनों पक्षों ने अपनी स्थिति पर दोबारा विचार किया और संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट से संयुक्त रूप से अनुरोध किया कि ये घोषित किया जाए कि उनका कोई वैध विवाह हुआ ही नहीं था.
दोनों ने अदालत के सामने स्वीकार किया कि उन्होंने कभी भी हिंदू विवाह की रस्में नहीं निभाईं और व्यवहारिक कारणों व बाहरी दबाव के चलते केवल प्रमाण पत्र हासिल किया था.
अदालत के सामने रखे गए तर्क
महिला के वकील ने कहा कि जब कोई वैध विवाह हुआ ही नहीं, तो तलाक का मामला भी कानूनी रूप से टिक नहीं सकता. वहीं पुरुष के वकील ने माना कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के अनुसार कोई रस्म नहीं हुई थी, लेकिन केवल पंजीकरण होने के कारण तलाक की अर्जी दी गई.
हिंदू विवाह पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या
अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 और 8 की विस्तार से व्याख्या की. कोर्ट ने कहा कि धारा 7 में प्रयुक्त शब्द ‘विवाह का संपन्न होना’ का मतलब है कि विवाह विधिपूर्वक रस्मों के साथ किया जाए. सप्तपदी जैसे संस्कार हिंदू विवाह का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. बिना इन रस्मों के, किसी पुरुष और महिला को पति-पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि विवाह का पंजीकरण विवाह को जन्म नहीं देता, बल्कि केवल पहले से हुए वैध विवाह का प्रमाण होता है. यदि धारा 7 के अनुसार विवाह हुआ ही नहीं, तो पंजीकरण भी बेअसर रहेगा.
अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि आजकल कई युवा केवल सुविधा के लिए, जैसे वीजा या अन्य कारणों से, बिना विवाह किए ही पंजीकरण करा लेते हैं. कोर्ट ने कहा कि अगर बाद में विवाह ही न हो, तो ऐसे मामलों में रिश्ते की कानूनी और सामाजिक स्थिति क्या होगी, यह गंभीर प्रश्न है. कोर्ट ने ये भी साफ किया कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत केवल कानूनी प्रक्रिया से विवाह संभव है, लेकिन हिंदू विवाह अधिनियम में धार्मिक रस्में अनिवार्य हैं. एक कानून की शर्तें दूसरे पर लागू नहीं की जा सकतीं.
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने ये घोषित किया कि 7 जुलाई 2021 को दिखाया गया विवाह, हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार विवाह नहीं है. इसलिए न तो निजी संस्था का प्रमाण पत्र और न ही सरकारी पंजीकरण मान्य है.
अदालत ने ये भी कहा कि दोनों पक्ष कभी पति-पत्नी बने ही नहीं. इस घोषणा के बाद अदालत ने तलाक मामला, भरण-पोषण केस, एफआईआर और सभी संबंधित कार्यवाहियों को रद्द कर दिया.

