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Explainer: क्या तीन तलाक के बाद अब खत्म होगा ‘तलाक-ए-हसन’? जानिए, देशभर में क्यों हो रही चर्चा?

सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार बेनजीर हिना के केस में तलाक-ए-हसन पर बड़ा फैसला सुनाया है, जानिए क्या है तलाक-ए-हसन, तीन तलाक से कितना अलग है. इसकी खामियां और क्यों इस प्रथा पर देशभर में बहस तेज हो गई है.

Published by Shivani Singh

क्या तीन तलाक के बाद अब ‘तलाक-ए-हसन’ भी खत्म हो जाएगा? देशभर में इस मुद्दे पर तेज़ बहस छिड़ चुकी है क्योंकि सवाल सिर्फ शादी–विवाह का नहीं, बल्कि मुस्लिम महिलाओं की इज़्ज़त और अधिकारों का है. आखिर इस्लाम में तलाक-ए-हसन क्या होता है? क्यों इसे भी महिलाओं के खिलाफ एकतरफा तलाक माना जा रहा है? और सुप्रीम कोर्ट में पत्रकार बेनजीर हिना के केस ने कैसे इस पुराने नियम को नए सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है? आइए जानते हैं पूरा मामला…

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई

दरअसल पेशे से पत्रकार बेनज़ीर हिना ने तलाक़-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी. उनकी लड़ाई सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं, बल्कि अपने बच्चे के हक़ के लिए भी थी. उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनके पति और संबंधित संस्थाओं को सख़्त निर्देश दिए. कोर्ट का सबसे अहम फ़ैसला बच्चे के गुज़ारे के बारे में था. कोर्ट ने हिना के पति को बच्चे के खर्च के लिए हर महीने 10,000 रुपये देने का आदेश दिया. यह रकम बच्चे की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए दी जाएगी. अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता के झगड़े की वजह से बच्चे की पढ़ाई पर असर पड़ता है. हिना के मामले में भी ऐसा ही हुआ था वह अपने बच्चे का एडमिशन अच्छे स्कूल में कराना चाहती थी, लेकिन पिता की सहमति या अन्य डॉक्यूमेंट्स मुश्किलें खड़ी कर रही थीं. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने सीधे स्कूल को बच्चे का तुरंत एडमिशन कराने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने साफ किया कि पिता के सहयोग न करने की वजह से बच्चे की पढ़ाई में रुकावट नहीं आनी चाहिए. कोर्ट ने आधार और पासपोर्ट से जुड़ी रुकावटों को भी हटाने का आदेश दिया है.

तलाक-ए-हसन क्या है?

अब सवाल यह उठता है कि आखिर तलाक-ए-हसन क्या है? और यह ‘ट्रिपल तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) से कैसे अलग है. इस्लाम में तलाक के कई तरीके बताए गए हैं. इनमें से एक है तलाक-ए-हसन. इस तरीके में, एक मुस्लिम आदमी अपनी पत्नी को एक बार में तीन तलाक नहीं देता है. इसके बजाय, वह उन्हें तीन महीने के समय में तलाक देता है.

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  1. पहली बार: पति एक बार तलाक देता है. इसके बाद, कपल के पास सुलह के लिए एक महीने का वक़्त होता है. अगर इस दौरान वे फिजिकल रिलेशन बनाते हैं या सुलह कर लेते हैं, तो तलाक को अमान्य माना जाता है.
  2. दुसरी बार: दुसरी बार तलाक तब दिया जाता है जब अगर पहले महीने में सुलह नहीं होती है, तो पति अगले महीने (पवित्रता या ‘तुहर’ के समय) दूसरी बार तलाक देता है. फिर, उनके पास मामले को सुलझाने के लिए एक महीना होता है.
  3. तीसरी बार: अगर तीसरे महीने में सुलह नहीं होती है और पति तीसरी बार “तलाक” बोल देता है, तो तलाक इर्रिवोकेबल हो जाता है. इसके बाद पति-पत्नी के बीच का रिश्ता खत्म माना जाता है.

तलाक-ए-हसन की खामियां क्या है?

यह प्रोसेस तुरंत तीन तलाक से बेहतर लग सकता है क्योंकि इसमें इसे पलटने का मौका मिलता है. हालांकि, इसका विरोध करने वालों का कहना है कि यह भी एकतरफा है. मतलब, तलाक देने का पूरा हक सिर्फ मर्द के पास है. जिसमें पत्नी की सहमति या इच्छा की कोई भूमिका नहीं होती. इसके कारण यह प्रथा कई बार मनमानी, भेदभावपूर्ण और अनुचित हो सकती है, जिससे महिलाएं सामाजिक और कानूनी तौर पर असहाय महसूस करती है, खासकर जब पति तलाक का नोटिस वकील के माध्यम से भेजता है और दूसरी शादी कर लेता है, जबकि कानूनी प्रक्रिया पूरी न होने से महिला कई कानूनी या लीगल कार्यवाई जैसे बच्चे के दाखिले या अन्य दस्तावेजों में परेशानी का सामना करना पड़ता है. इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे सभ्य समाज के मानदंडों के विपरीत और महिलाओं के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15, 21) का उल्लंघन करने वाला बताया है.

क्या भविष्य में तीन तलाक की तरह ख़त्म हो जाएगी ये प्रथा

हाँ,, तलाक-ए-हसन को भविष्य में खत्म किया जा सकता है. विशेष रूप से भारत में, क्योंकि इसकी संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रथा, जो केवल पति को एकतरफा तलाक देने का अधिकार देती है, मनमानी है और महिलाओं के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15, 21) का उल्लंघन करती है, ठीक वैसे ही जैसे तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित किया गया था. लैंगिक समानता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित आधुनिक कानूनी व्यवस्था में, पुरुषों को एकतरफा तलाक का अधिकार देना इन सिद्धांतों के विपरीत माना जाता है. इसके अलावा, यदि भविष्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू होता है, तो यह मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों को समाप्त कर देगा, जिससे तलाक-ए-हसन जैसी प्रथाएं खुद ही खत्म हो जाएंगी और तलाक के लिए एक धर्म-निरपेक्ष और समान कानून लागू हो जाएगा.

Shivani Singh

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