Bihar Rajya Sabha elections: बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए हुए चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दे दिया है. एनडीए ने सभी पांचों सीटों पर जीत हासिल कर विपक्षी महागठबंधन को बड़ा झटका दिया है. इस जीत के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि राज्यसभा के लिए चुने गए नीतीश कुमार क्या आने वाले समय में मुख्यमंत्री पद छोड़कर नई राजनीतिक भूमिका में नजर आएंगे.
एनडीए ने पांचों सीटों पर जमाया कब्जा
राज्यसभा चुनाव में एनडीए के सभी उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. जनता दल (यूनाइटेड) की ओर से नीतीश कुमार और रामनाथ ठाकुर को जीत मिली. वहीं भारतीय जनता पार्टी की तरफ से नितिन नबीन और शिवेश राम राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. इसके अलावा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेन्द्र कुशवाहा भी राज्यसभा पहुंचने में सफल रहे. इस तरह बिहार से राज्यसभा की पांचों सीटों पर एनडीए ने कब्जा जमाकर अपना राजनीतिक वर्चस्व दिखाने की कोशिश की है.
मतदान के दौरान विपक्ष को लगा झटका
राज्यसभा चुनाव के लिए बिहार विधानसभा में सुबह 9 बजे से मतदान शुरू हुआ और शाम 4 बजे तक प्रक्रिया चली. विधानसभा के कुल 243 विधायकों को वोट डालना था. एनडीए के सभी 202 विधायक मतदान में शामिल हुए, जबकि महागठबंधन के सिर्फ 37 विधायक ही वोट डाल पाए. दरअसल विपक्ष के चार विधायक मतदान के लिए विधानसभा नहीं पहुंचे, जिससे विपक्ष का गणित बिगड़ गया और एनडीए को सीधा फायदा मिला.
विपक्ष के चार विधायक नहीं पहुंचे वोट देने
महागठबंधन के जिन विधायकों ने मतदान नहीं किया, उनमें राष्ट्रीय जनता दल के ढाका विधायक फैज़ल रहमान शामिल थे. इसके अलावा कांग्रेस के तीन विधायक भी वोट डालने नहीं पहुंचे. कांग्रेस के मनोहर प्रसाद, सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा और मनोज विश्वासकी गैरमौजूदगी पूरे दिन चर्चा का विषय बनी रही. इन चार विधायकों की अनुपस्थिति ने महागठबंधन की रणनीति को कमजोर कर दिया.
आखिरी सीट पर था मुकाबला
पांच में से चार सीटों पर एनडीए की जीत लगभग तय मानी जा रही थी, क्योंकि उसके पास पर्याप्त संख्या बल था. लेकिन पांचवीं सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो गया था. इस सीट पर एनडीए के शिवेश राम और महागठबंधन के उम्मीदवार अमरेंद्र सिंह धारी आमने-सामने थे. हालांकि विपक्ष के चार विधायकों के मतदान में हिस्सा नहीं लेने से एनडीए को बढ़त मिल गई और अंततः पांचों सीटों पर उसकी जीत हो गई.
विपक्षी खेमे में निराशा
सूत्रों के मुताबिक विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता काफी देर तक गायब विधायकों का इंतजार करते रहे. पार्टी नेतृत्व लगातार उनसे संपर्क करने की कोशिश करता रहा, लेकिन मतदान की समय सीमा समाप्त होने तक वे विधानसभा नहीं पहुंचे. इस घटना के बाद विपक्षी खेमे में निराशा का माहौल देखा गया और महागठबंधन की रणनीति पर भी सवाल उठने लगे.
बिहार की राजनीति में बड़ा संदेश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव परिणाम के जरिए एनडीए ने बिहार में अपनी एकजुटता और संगठनात्मक ताकत का संदेश देने की कोशिश की है. दूसरी ओर महागठबंधन के लिए यह नतीजा एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है. हालांकि सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि राज्यसभा के लिए चुने गए नीतीश कुमार आगे चलकर बिहार की राजनीति में किस भूमिका में दिखाई देंगे और क्या वे मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे या नई जिम्मेदारी संभालेंगे.

