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अब हाईवे पर नहीं कर पाएंगे ये काम, कोर्ट ने सुनाया ऐसा फैसला, ड्राइवरों के उड़ गए होश

कार चालक ने दावा किया था कि उसने अचानक ब्रेक लगा दिए क्योंकि उसकी गर्भवती पत्नी को उल्टी जैसा महसूस हो रहा था।

Published by Divyanshi Singh

Highway Rule: सड़क हादसों से जुड़े एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईवे पर अचानक ब्रेक लगाना लापरवाही माना जाएगा। अदालत ने कहा कि अगर कोई कार चालक बिना किसी चेतावनी के हाईवे पर अचानक ब्रेक लगाता है, तो सड़क दुर्घटना होने पर उसे लापरवाह माना जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने सुनाया अहम फैसला

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने मंगलवार को कहा कि राजमार्ग के बीच में किसी चालक द्वारा वाहन को अचानक रोकना, चाहे वह व्यक्तिगत आपात स्थिति ही क्यों न हो, उचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इससे सड़क पर अन्य लोगों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।

न्यायमूर्ति धूलिया, जिन्होंने पीठ के लिए फैसला लिखा, ने कहा कि राजमार्ग पर वाहनों की तेज़ गति अपेक्षित है और यदि कोई चालक अपना वाहन रोकना चाहता है, तो यह उसकी ज़िम्मेदारी है कि वह सड़क पर पीछे चल रहे अन्य वाहनों को चेतावनी दे या संकेत दे।

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क्या है पूरा मामला

यह फैसला इंजीनियरिंग के छात्र एस. मोहम्मद हकीम की याचिका पर आया है, जिनका 7 जनवरी, 2017 को कोयंबटूर में एक सड़क दुर्घटना में बायाँ पैर काटना पड़ा था। यह घटना तब हुई जब हकीम की मोटरसाइकिल अचानक रुकी एक कार के पिछले हिस्से से टकरा गई। इससे हकीम सड़क पर गिर गए और पीछे से आ रही एक बस ने उन्हें टक्कर मार दी। कार चालक ने दावा किया था कि उसकी गर्भवती पत्नी को मिचली आ रही थी, इसलिए उसने अचानक ब्रेक लगा दिए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्पष्टीकरण को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कार चालक द्वारा राजमार्ग के बीच में अचानक कार रोकने के लिए दिया गया स्पष्टीकरण किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

हलाकि को  कार चालक 50% ज़िम्मेदार है और बस चालक 30% ज़िम्मेदार है। इसके अलावा, बाइक सवार (हकीम) 20% लापरवाह है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हकीम के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था और उसने कार से पर्याप्त दूरी नहीं बनाए रखी, जो उसकी लापरवाही थी। सुप्रीम कोर्ट ने कुल मुआवज़ा ₹1.14 करोड़ तय किया, लेकिन हकीम की 20% लापरवाही के कारण यह राशि घटकर ₹91.2 लाख रह गई। यह राशि कार और बस बीमा कंपनियों को चार हफ़्तों के भीतर चुकाने का निर्देश दिया गया।

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