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Eye cancer: अब सूअर के स्पर्म से होगा आंखों के कैंसर का इलाज? वैज्ञानिकों का अनोखा प्रयोग चर्चा में

Eye cancer: सूअर के स्पर्म से जुड़े एक्सोसोम का इस्तेमाल कर वैज्ञानिकों ने आंखों के कैंसर के इलाज के लिए एक नई तकनीक विकसित की है. यह आई ड्रॉप के रूप में दवा को सीधे ट्यूमर तक पहुंचाने में मदद कर सकती है.

Published by Ranjana Sharma

Eye cancer: कैंसर के इलाज को लेकर दुनियाभर में लगातार नए प्रयोग और शोध हो रहे हैं. इसी कड़ी में वैज्ञानिकों ने एक बेहद अनोखा तरीका सामने रखा है, जिसमें सूअर के स्पर्म से जुड़े तत्वों का इस्तेमाल आंखों के एक खतरनाक कैंसर के इलाज में किया जा सकता है. शुरुआती शोध में यह तरीका प्रभावी और अपेक्षाकृत सुरक्षित बताया जा रहा है, हालांकि अभी इसे इंसानों पर आजमाया जाना बाकी है.

क्या है बीमारी और क्यों है खतरनाक?

रेटिनोब्लास्टोमा आंखों का एक दुर्लभ लेकिन गंभीर कैंसर है, जो खासतौर पर छोटे बच्चों और शिशुओं को प्रभावित करता है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह न सिर्फ दृष्टि छीन सकता है बल्कि जान के लिए भी खतरा बन सकता है. इस बीमारी के मौजूदा इलाज-जैसे कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और इंजेक्शन-अक्सर दर्दनाक होते हैं और इनके कई साइड इफेक्ट्स भी सामने आते हैं.

सूअर के स्पर्म से क्या मिला नया रास्ता?

हालिया शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि सूअर के स्पर्म में मौजूद बेहद छोटे कण, जिन्हें एक्सोसोम कहा जाता है, शरीर के भीतर दवाओं को पहुंचाने का काम कर सकते हैं. ये एक्सोसोम खास प्रोटीन की मदद से शरीर की जैविक बाधाओं को पार कर लेते हैं, जिससे वे दवा को सीधे प्रभावित हिस्से तक पहुंचाने में सक्षम होते हैं.

कैसे तैयार किया गया आई ड्रॉप?

  • शोधकर्ताओं ने इन एक्सोसोम को फोलिक एसिड और एक खास नैनोजाइम सिस्टम के साथ मिलाकर आई ड्रॉप तैयार किया.
  • फोलिक एसिड ट्यूमर कोशिकाओं को पहचानने में मदद करता है
  • नैनोजाइम सिस्टम कैंसर सेल्स को खत्म करने में एक्टिव होता है
  • एक्सोसोम दवा को आंख के अंदर तक पहुंचाने का रास्ता बनाते हैं

आंख के अंदर कैसे पहुंचती है दवा?

  • यह आई ड्रॉप आंख की दो अहम परतों-कॉर्निया और कंजंक्टिवा-के जरिए अंदर प्रवेश कर सकती है.
  • एक्सोसोम अस्थायी रूप से आंख की सुरक्षा परत को खोल देते हैं, जिससे दवा सीधे ट्यूमर तक पहुंच सके और असर दिखा सके.

    अभी कहां तक पहुंचा है शोध?

    यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है और इसका परीक्षण फिलहाल चूहों पर किया गया है. नतीजे सकारात्मक बताए जा रहे हैं, लेकिन इंसानों पर ट्रायल से पहले और कई चरणों की जांच जरूरी है. फिलहाल इसे पूरी तरह सुरक्षित या इलाज का पक्का विकल्प नहीं कहा जा सकता. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर आगे के परीक्षण सफल रहते हैं, तो यह भविष्य में एक कम दर्दनाक और ज्यादा टारगेटेड इलाज बन सकता है. अगर यह तकनीक सफल होती है, तो न सिर्फ रेटिनोब्लास्टोमा बल्कि अन्य बीमारियों के इलाज के लिए भी नई संभावनाएं खुल सकती हैं. खासकर बच्चों में होने वाले कैंसर के इलाज को यह आसान और कम जोखिम भरा बना सकता है.
Ranjana Sharma
Published by Ranjana Sharma
Tags: Eye cancer

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