दिल्ली की पुरानी जेल में बंद थे वे जो देश की आजादी के लिए लड़े

यह पुरानी जेल सिर्फ पत्थरों का समूह नहीं है यह उन आवाजों और बलिदानों का जीवंत प्रतीक है जो भूल नहीं सकते. आज यह संरचना मलबों और घासों के बीच दबकर रह गई है.

Published by Komal Singh

नई दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के पास 2019 में एक निर्माण कार्य के दौरान पुरानी सेंट्रल जेल की दीवारों के अवशेष मिले. यह वह जेल है जहाँ अंग्रेजों के समय आजादी के आंदोलनकारियों को कैद किया जाता था, और कई को फांसी दी गई थी. आज यह जगह वीरान पड़ी है. घास-फूस से ढकी, इतिहास की गर्द में खोई. लेकिन इसकी दिवारों में आवाजे आज भी गूंजती हैं. यह संग्रह सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बलिदान, निष्ठा और आजादी का प्रतीक है. आइए जानें इस पुरानी जेल से जुड़े  खास  बाते , जो हमें उसकी महानता और कहानियों से जोड़ते हैं:

 

 अवशेषों की खोज और राजनीतिक विवाद

 2019 में मॉडर्न निर्माण कार्य के दौरान पुरानी जेल की नींव संभ्रांत क्षेत्रों में खुली. लेकिन बाद में यह जगह सरकारी योजनाओं और राजनीतिक बयानबाजियों के बीच उलझा रहा. इस विवाद ने इतिहास और वर्तमान के बीच की खाई को उजागर किया. यह दर्शाता है कि कैसे आज भी इतिहास को दबाया या अनदेखा किया जा सकता है.

 

  सराय से जेल तक  

 दरअसल इस स्थल की शुरुआत एक सराय रूप में हुई थी. मुगल बादशाह फरीद खान द्वारा इस सराय को बनवाया गया था. लेकिन अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी में इसे जेल में बदल दिया, ताकि क्रांतिकारियों को बंद किया जा सके. यह स्थान समय के साथ बदलाव का जीता-जागता उदाहरण बन गया शांति की निवास से निरंकुश शासन की जगह.

 

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 आजादी के आंदोलनकारियों की सजाएँ और संवेदनाएँ

 इस जेल में 1912 के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर हमले की साजिश करने वालों को बंदी बनाया गया और कुछ को फांसी दी गई. इसके अलावा, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई क्रांतिकारियों को यहां भेजा गया. एक कैदी द्वारा भूख हड़ताल करने का वर्णन मौजूद है. इन घटनाओं से पता चलता है कि इस जेल ने केवल दंड नहीं, बल्कि मानवीय संघर्ष और दृढ़ संकल्प की गूँज भी सहेजी है.

 विधानसभा और राजनीतिक दावे

 2022 में दिल्ली विधानसभा ने इस पुराने जेल की हिस्से को “ब्रिटिश-काल का फांसी घर” बताया और कहा कि यह लाल किले से गुप्त सुरंग से जुड़ी थी. लेकिन विरोध में दूसरी पार्टियों ने इसे राजनीतिक ड्रामा करार दिया. नक्शों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर तर्क दिया गया कि यह मूल रूप से सर्विस रूम था. इस बहस ने दिल्ली की राजनीति में इतिहास की सत्ता को फिर से सामने ला दिया.

 

 वर्तमान में वीरान जगह और भूलती गाथाएं

 आज यह स्थल घास और कचरे से भरा पड़ा है. टूटी तख्तियाँ और एक शहीद स्मारक ही एकमात्र पहचान बचा रही है. स्थानीय लोग कहते हैं कि उनकी दादी-बाबाओं ने इस जेल की कहानियाँ बताई थीं, लेकिन समय के साथ सब कुछ भूलने की प्रक्रिया शुरू हो गई. जगह अब भी इतिहास के पन्नों में दबा हुआ प्रतीक है, जो अपनी कहानी सुनाने की राह देख रहा है.

Komal Singh
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