कारगिल युद्ध और नाना पाटेकर, जब फिल्मी पर्दे का नायक सीमाओं पर असली ‘क्रांतिकारी’ बना

1999 के कारगिल युद्ध (Kargil War) के दौरान, अभिनेता नाना पाटेकर (Actor Nana Patekar) ने अपनी फिल्मी पहचान पीछे छोड़ दी और ढाई महीने तक भारतीय सेना की सेवा की थी.

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When Nana Patekar Served the Nation During the Kargil War:  साल 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान, अभिनेता नाना पाटेकर ने अपनी फिल्मी पहचान पीछे छोड़कर और ढाई महीने तक भारतीय सेना (मराठा लाइट इन्फैंट्री) के साथ अग्रिम मोर्चों पर कुछ समय बिताया था. जहां, उन्होंने सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और साथ ही युद्ध की विभीषिका के बीच उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे. इसके अलावा, उनका यह कदम देश के लिए प्यार को दर्शाता है, जिसपर उन्होंने कहा कि  “इतना तो कर सकते हैं देश के लिए,”. अभिनेता नाना पाटेकर केवल अपनी दमदार एक्टिंग के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी गहरी देशभक्ति और सादगी के लिए भी देशभर में जाने जाते हैं.

नाना पाटेकर ने सीमा पर जाने का लिया था फैसला

आप में से बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल की बर्फीली चोटियों पर युद्ध चल रहा था, तब अभिनेता नाना पाटेकर ने बॉलीवुड की चकाचौंध को छोड़कर सीमाओं पर जाने का सबसे बड़ा फैसला लिया था. दरअसल, वे वहां किसी फिल्म की शूटिंग के लिए नहीं, बल्कि एक सैनिक के रूप में मनोबल बढ़ाने के लिए ही गए थे. इसके साथ ही  नाना पाटेकर ने ‘मराठा लाइट इन्फैंट्री’ के साथ ढाई महीने से ज्यादा का भी समय बिताया था. 

सीमा पर सैनिकों के बीच एक सिपाही का अनोखा प्रेम

कारगिल युद्ध के दौरान नाना पाटेकर ने सिर्फ और सिर्फ औपचारिक मुलाकातें नहीं कीं. उन्होंने सैनिकों के साथ बंकरों में समय बिताया, उनके साथ खाना खाया और उन्हीं की तरह कठिन परिस्थितियों में रहने की कोशिश की. वे अक्सर सैनिकों से कहा करते थे कि असली नायक वे हैं जो गोलियों का सामना कर रहे हैं, न कि वे जो पर्दे पर अभिनय करते हैं. 

तो वहीं, दूसरी तरफ साल 1990 के दशक की शुरुआत में उन्होंने सेना के साथ प्रशिक्षण भी लिया था और उन्हें ‘टेरिटोरियल आर्मी’ में मानद रैंक से पूरी तरह से सम्मानित भी किया गया था.  कारगिल के दौरान उन्होंने अपनी इस ट्रेनिंग का सम्मान रखा और अग्रिम चौकियों पर जाकर जवानों के उत्साह को और भी ज्यादा दोगुना किया था. 

नाना पाटेकर का यह योगदान हमें याद दिलाता है कि देश की सेवा केवल वर्दी पहनकर ही नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों को समझकर भी की जानी चाहिए. उनकी सादगी और “देश के लिए कुछ भी कर गुजरने” की भावना आज भी करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है. 

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