जिसके सामने फीके थे राज कपूर-दिलीप कुमार, कौन था वह एक्टर जो हो गया बर्बाद; अमिताभ बच्चन ने देखा था बस स्टॉप पर

Bharat Bhushan: 1950 के दशक का सबसे सफल एक्टर जिसने बॉलीवुड से कमाए पैसों बंगले खरीदे और कारों की लाइन लगा दी. आखिर ऐसा क्या हुआ जो अंतिम समय में कोई अर्थी उठाने वाला तक नसीब नहीं हुआ.

Published by JP Yadav

Bharat Bhushan: 1950 का दशक देश के साथ-साथ भारतीय सिनेमा के लिए अहम रहा. आजादी के बाद देश आकार ले रहा था तो फिल्म इंडस्ट्री में म्यूजिक, कैमरा समेत अन्य विभागों में प्रयोग हो रहे थे. देव आनंद, राजकुमार, राज कपूर और दिलीप कुमार फिल्म इंडस्ट्री के कामयाब हीरो बन चुके थे. राज कपूर की फिल्म ‘आग’ 6 अगस्त 1948 को रिलीज हुई थी. यह राज कपूर द्वारा निर्देशित और निर्मित पहली फिल्म थी. इसके ठीक 7 साल पहले यानी वर्ष 1941 में एक एक्टर का उदय फिल्मी दुनिया में हो चुका था. वर्ष 1941 में फिल्म चित्रलेखा से फिल्म इंडस्ट्री में शुरुआत हुई, लेकिन उन्हें एक दशक तक संघर्ष करना पड़ा. 1952 में एक ऐसी फिल्म आई, जिसने इस हैंडसम एक्टर को पूरे देश में लोकप्रिय कर दिया. संगीत की मामूली समझ रखने वाले लोगों के दिलों में भी इस कलाकार पर फिल्माए गए गाने उतर चुके थे. यहां हम बात कर रहे हैं एक्टर भारत भूषण (भरत भूषण) की, जिन्होंने अपने अभिनय और खूबसूरत से एक दौर में देव आनंद, दिलीप कुमार और राज कपूर को चुनौती दे दी थी. एक दशक तक फिल्मी दुनिया में टॉप पर रहने वाले भारत भूषण का अंत बहुत दुखद हुआ. फकीरी की हालत में पहुंच गए भारत भूषण के निधन के बाद उनके करीबी कांधा देने तक नहीं आए. उनके अंतिम दर्शन के लिए बॉलीवुड से जुड़ा कोई कलाकार तक नहीं पहुंचा.

फिल्म देखी तो पिता ने घर पहुंचते ही की पिटाई

 मेरठ में 14 जून, 1920 को जन्में भारत भूषण के पिता रायबहादुर मोतीलाल नामी वकील थे. पैसा और रुतबा ऐसा कि शहर में जिस सड़क से गुजर जाएं तो सलाम करने वालों की कमी नहीं रहती. जमींदार रायबहादुर मोतीलाल चाहते थे कि उनका बेटा भी उनकी तरह वकील बने और नाम कमाए, लेकिन भारत भूषण का मन एक्टर बनने का था. भारत भूषण ने एक इंटरव्यू में खुद कबूल किया था कि उनके पिता किसी काम से शहर से बाहर गए थे. इसके बाद वह दोस्तों के साथ फिल्म देखने चले गए. वापस लौटे तो पिता को पता चल गया. इसके बाद पिता ने भारत भूषण की खूब पिटाई की. इसके बाद भावुक भारत भूषण पिता से अलग रहने लगे. 

कॉलेज से ही था एक्टिंग का शौक

भारत भूषण बचपन से ही बहुत दुर्भाग्यशाली थे. जन्म के 2 साल के भीतर उनकी मां का निधन हो गया. जाहिर कि वह यह भी नहीं बता सकते थे कि उनकी मां का चेहरा कैसा था. उनका एक बड़ा भाई भी था. मां के निधन के बाद भारत भूषण अपने बड़े भाई के साथ अपने दादा के साथ रहने के लिए अलीगढ़ आ गए. अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के दौरान ही उनका रुझान फिल्मों की तरफ होने लगा. उनके बड़े भाई फिल्म निर्माता थे और वह आइडियल स्टूडियो के मालिक थे. फिल्मों में जाने के लिए पिता से इजाजत मांगी तो ‘ना’ सुनने को मिला. पिता के फैसले के खिलाफ वह कोलकाता गए और बाद में बॉम्बे में अपनी पहचान बनाई.

‘भक्त कबीर’ में किया पहला रोल

मुंबई पहुंचे तो यहां की चकाचौंध ने प्रभावित किया, लेकिन जल्द ही उन्हें यह भी एहसास हो गया कि स्ट्रगल बहुत करना पड़ेगा. उन्होंने स्टुडियोज के चक्कर काटने शुरू कर दिए. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बॉम्बे आने से पहले उन्हें कोलकाता के शख्स ने एक खत दिया. वह भी फिल्मी दुनिया से वाकिफ था. भारत भूषण जब मुंबई पहुंचे तो उन्होंने मशहूर डायरेक्टर महबूब खान को खत दिया. उस समय महबूह खान ‘अलीबाबा चालीस चोर’ के लिए स्टारकास्ट फाइनल कर चुके थे. महबूब खान ने रोल के लिए मना कर दिया तो उन्हें बहुत ज्यादा निराशा हुई. इसके बाद स्टुडियोज के चक्कर काटने के दौरन भारत भूषण को पता चला कि डायरेक्टर रामेश्वर शर्मा ‘भक्त कबीर’ फिल्म बना रहे हैं. लीड रोल किसी और को मिल चुका था. रामेश्वर ने उन्हें फिल्म में काशी नरेश का रोल ऑफर किया. इसके साथ ही उन्हें 60 रुपये महीने की नौकरी पर रख दिया. 

इस तरह 1942 में रिलीज हुई फिल्म ‘भक्त कबीर’ में उन्होंने जीवन का पहला रोल किया.  इसमें भी एक ट्विस्ट है. दरअसल, भारत भूषण अभिनीत फिल्म ‘चित्रलेखा’ वर्ष 1941 में रिलीज हुई और हिेट रही. इसे किदार शर्मा ने निर्देशित किया था. जबकि  ‘भक्त कबीर’ साल 1942 में रिलीज़ हुई थी. बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि ‘चित्रलेखा’ वर्ष 1941 की दूसरी सबसे बड़ी हिट थी. 

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9 सालों में 15 फिल्मों में किया काम

‘भक्त कबीर’ रिलीज हुई तो भारत भूषण का रोल भी चर्चा में आया. किसे पता था कि यह रोल एक्टर के लिए लकी साबित होगा. इसके बाद भारत भूषण की झोली में कई फिल्में आईं. यह भी सच है कि अच्छी फिल्मों में अभिनय के लिए एक्टर ने कई सालों तक संघर्ष किया. भारत भूषण ने  ‘चित्रलेखा’ के बाद वर्ष 1943 से लेकर 1952 तक करीब 15 फिल्मों में काम किया. इनमें भाईचारा (1943), सावन (1945), सुहाग रात (1948), उधार (1949), भाई बहन (1950) और आंखें(1950) थीं.  इन सभी फिल्मों में भारत भूषण के शानदार काम की सराहना मिली. 

‘बैजू-बावरा’ की कामयाबी ने एक्टर को किया मालामाल

वर्ष 1954 में ‘औरत तेरी यही कहानी’ और ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ रिलीज हुई, जिसमें भारत भूषण कमाल की एक्टिंग की तारीफ हुई.   इसी साल आई ‘बैजू-बावरा’, जिसने भारत भूषण की किस्मत ही पलट दी. यह फिल्म सुपर-डुपर हिट रही.  इस साल तीनों फिल्मों ने भारत भूषण पर जमकर धनवर्षा की. बैंक बैलेंस बहुत हो गया तो भारत भूषण ने मुंबई में दो बंगले खरीद डाले. यह अलग बात है कि ‘बैजू बावरा’ फिल्म आने से पहले ही उन्होंने मुंबई के सांताक्रूज में एक बंगला खरीदा था. यह बंगला आशा पारेख के बंगले के पास था. ‘बैजू बावरा’ से मिले पैसों से भारत भूषण ने पाली हिल में एक और बंगला खरीदा और उसी में शिफ्ट हो गए. उन्होंने मुंबई से कुछ दूर पुणे में भी एक बंगला खरीद लिया, जहां वह अक्सर आते-जाते रहते थे.  इसके अलावा भारत भूषण ने महंगी कारों की लाइन लगा दी. 

कामयाबी मिली ऐसी… बैंक खाते में भरे पैसे

कामयाबी पाना और उसे संभालना दो अलग-अलग चीजें हो जाती हैं. भारत भूषण पहली चीज को आसानी से पा रहे थे, लेकिन संभालने में वह गलती कर गए. भारत भूषण के बड़े भाई भी प्रॉड्यूसर थे. उन्होंने भारत भूषण को भी प्रॉड्यूसर बनने की सलाह दे डाली. बड़े भाई की सलाह मान ली और उन्होंने दो फिल्में ‘बसंत बहार’ और ‘बरसात की रात’ प्रॉड्यूस की. ये दोनों फिल्में सुपरहिट हुईं. भारत भूषण की तिजोरी भर गई और उनके पास काफी पैसा आ गया.  

भतीजे को हीरो बनाने के चक्कर में हो गए बर्बाद

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत भूषण बतौर प्रॉड्यूसर भी कामयाब हो रहे थे. इस बीच बड़े भाई रमेश ने उन्हें और फिल्में बनाने के लिए उकसाया. रमेश ने कहा कि  उनके बेटे को हीरो बना दो. भारत भूषण ने भाई की बात मानी और उसे हीरो बना दिया. इसके बाद भारत भूषण की किस्मत रूठ गई. इसके बाद भारत भूषण ने जितनी भी फिल्में बनाईं वो सारी फ्लॉप होती गईं. भारत भूषण को घर-बार सब बेचना पड़ा और पाई-पाई को मोहताज हो गए. हालात यह हो गए कि सड़क पर आ गए. 

दर्द भरे रहे जिंदगी के आखिरी दिन

एक-एक कर भारत भूषण के सारे बंगले बिक गए. कारों का कारवां भी बेचना पड़ा. कहा जाता है कि अमिताभ बच्चन ने उन्हें एक बस स्टॉप पर देखा था, जब वह लाइन में लगे थे. कहा यहां तक जाता है कि उन्होंने गार्ड की नौकरी भी की.  उनकी बेटी अपराजिता इस बात से साफ करती हैं और उन्होंने इसे अफवाह बताया. 72 वर्ष की उम्र में 27 जनवरी, 1992 को भारत भूषण ने एक सामान्य अस्पताल में इलाज के दौरान दुनिया को अलविदा कह दिया. कहा जाता है कि उनके निधन पर कोई बॉलीवुड सेलिब्रिटी नहीं पहुुंचा. फिल्मी दुनिया में कामयाबी के बाद जिसे अपने सिर पर उठाती थी उस भारत भूषण को किसी सेलिब्रिटी का कंधा तक नसीब नहीं हुआ. 

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