UGC new rules controversy: नए UGC (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) नियमों के खिलाफ फिलहाल पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे है. UGC के संबंध में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी पत्र भेजे गए है. पत्रों में आरोप लगाया गया है कि यह बिल जाति-आधारित भेदभाव को बढ़ावा देने के लिए लाया जा रहा है. इस बीच कई संगठनों का दावा है कि ये नियम ऊंची जातियों के खिलाफ है. यह भी कहा जा रहा है कि सरकार इस मुद्दे पर बीच का रास्ता निकालने की तैयारी कर रही है.
UGC और उसके नए नियम क्या?
केंद्र सरकार ने प्रमुख शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम लागू किए है. अब देश के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को भेदभाव की शिकायतों की जांच के लिए समानता समितियां बनानी होंगी. नए UGC नियमों के अनुसार इन समितियों में OBC, SC, ST, दिव्यांग व्यक्तियों और महिलाओं के सदस्यों को शामिल करना अनिवार्य कर दिया गया है. अधिकारियों का कहना है कि इन नियमों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कैंपस में सभी जातियों के छात्रों के साथ समान व्यवहार हो और एक सकारात्मक माहौल बना रहे है. इसके अलावा इसका मकसद पिछड़े वर्गों के छात्रों की शिकायतों को समय पर हल करना भी है.
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नोटिस के अनुसार हर संस्थान को एक ‘समान अवसर केंद्र’ (EOC) खोलना होगा. यह केंद्र वंचित समूहों के लिए योजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी करेगा और छात्रों को शैक्षणिक, वित्तीय और सामाजिक मामलों पर सलाह भी देगा. इसका मुख्य काम कैंपस में विविधता और समानता को बढ़ावा देना होगा. अगर किसी कॉलेज की समिति में कम से कम पांच सदस्य नहीं हैं, तो संबद्ध विश्वविद्यालय का केंद्र उसका काम संभालेगा.
EOC का काम क्या होगा?
EOC का काम संबंधित समुदाय को समान अवसर प्रदान करना, समावेशन को बढ़ावा देना, छात्रों, शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच समानता बढ़ाना, छात्रों के बीच भेदभाव की भावना को कम करना, वंचित वर्गों के छात्र समूहों की सहायता करना और शिकायतों के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल बनाना होगा.
पूरा विवाद क्या है?
कई सामाजिक संगठनों ने नए नियमों को असंवैधानिक, सामाजिक न्याय विरोधी और उच्च जाति समुदाय पर सीधा हमला बताया है. राष्ट्रपति को भेजे गए एक ज्ञापन में कहा गया है कि ये नियम समानता की आड़ में उच्च जातियों के छात्रों के शैक्षणिक अधिकारों को कमजोर करने का एक प्रयास है. इस कदम को उच्च शिक्षा संस्थानों में वर्षों से चल रहे सामाजिक न्याय के संघर्ष के लिए एक झटका माना जा रहा है.
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यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुंचा?
उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए UGC द्वारा 13 जनवरी को नोटिफ़ाई किए गए उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले विनियम, 2026 के एक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.
इस नियम के खिलाफ एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें UGC के नए नियम 3(c) को रद्द करने की मांग की गई है, इसे मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताया गया है. याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह प्रावधान, उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नाम पर, कुछ वर्गों (खासकर सामान्य श्रेणी) के खिलाफ़ भेदभाव को बढ़ावा देता है और कुछ समूहों को शिक्षा से वंचित कर सकता है. याचिका में यह भी कहा गया है कि यह UGC अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के विपरीत है और उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के मौलिक उद्देश्य को कमजोर करता है.

