Bihar Election Result 2025: बिहार में एक बार फिर NDA की सरकार, जानें कौन से थे वो फैक्टर्स जिनके दम पर डूबी महागठबंधन की नाव?

Bihar election 2025 Results: तेजस्वी ने भी युवाओं, महिला वोटर्स को अपने पक्ष में लाने के लिए काफी वादें किए. लेकिन जैसा दिख रहा है कि बिहारी जनादेश ने उन्हें पूरी तरह से किनारा कर दिया.

Published by Shubahm Srivastava

Bihar Election Result News: बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर मतगणना जारी है. सामने आ रहे आकड़ों को देखें तो एनडीए प्रचंड बहुमत के साथ एक बार फिर से सरकार बनाने जा रही है. एनडीए अभी 200 प्लस सीटों पर बढ़त बनाये हुए है. महागठबंधन अपने शर्मनाक हार की तरफ बढ़ रही है. वहीं अगर हम नीतीश कुमार की सीट पर नजर डालें तो नीतीश कुमार किसी भी विधानसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. बता दें कि आखिरी बार 2004 में नीतीश कुमार नालंदा से लोकसभा चुनाव लड़े थे. 

उसके बाद 2005 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने उसके बाद से लगातार विधान परिषद का सदस्य रहे हैं. इस बार का बिहार चुनाव कई मायनों में अलग रहा, वोटिंग के मामले में भी पिछले कई सारे रिकॉर्ड टूट गए. महिलाओं ने भी पुरषों से आगे बढ़कर मतदान किया.

इसके अलावा तेजस्वी ने भी युवाओं, महिला वोटर्स को अपने पक्ष में लाने के लिए काफी वादें किए. लेकिन जैसा दिख रहा है कि बिहारी जनादेश ने उन्हें पूरी तरह से  किनारा कर दिया. चलिए एक बार उन फैक्टर्स पर नजर डाल लेते हैं जिसके चलते एनडीए को भारी जीत औऱ महागठबंधन का ये हाल हो गया.

जंगल राज का डर

मुख्य और निर्णायक कारक जंगल राज का डर था. एनडीए लगातार 1990 और 2005 के बीच के दौर की यादें ताज़ा करता रहा, जब अपहरण, हत्या और भ्रष्टाचार बिहार की पहचान थे. ख़ासकर महिलाएँ इस आख्यान से सबसे ज़्यादा प्रभावित दिखीं. तेजस्वी जितना ज़्यादा बदलाव की बात करते, एनडीए उतना ही ज़्यादा अतीत का डर पैदा करता, और यह रणनीति कारगर रही.

अस्वीकृत दावे

दूसरा कारक अवास्तविक रोज़गार के वादे थे. तेजस्वी यादव ने हर घर में एक नौकरी देने का वादा किया था, जिसे एनडीए ने “असंभव” बताया. तेजस्वी के इस बड़े वादे ने युवाओं में चर्चा तो पैदा की, लेकिन विश्वसनीय साबित नहीं हो पाए. 2.5 करोड़ से ज़्यादा सरकारी नौकरियों का दावा जनता में विश्वास जगाने में नाकाम रहा.

जातिगत समीकरण नाकाम

जातिगत समीकरण हमेशा से राजद की ताकत रहे हैं, लेकिन इस बार वे उलटे पड़ते दिखे. मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण मज़बूत रहा—90% यादवों ने महागठबंधन को वोट दिया. हालाँकि, अन्य जातियाँ, खासकर अति पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के गठबंधन के साथ मजबूती से जुड़ी रहीं और यह बदलाव निर्णायक साबित हुआ.

कांग्रेस का कमज़ोर प्रदर्शन

कांग्रेस के खराब प्रदर्शन ने महागठबंधन की कमज़ोरी को और बढ़ा दिया. पार्टी ने 61 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन शुरुआती रुझानों में उसे केवल 9 सीटों पर बढ़त मिली. 2020 में, उसे 19 सीटें मिलीं, और इस गिरावट ने महागठबंधन की समग्र लड़ाई को कमज़ोर कर दिया.

नीतीश कुमार का मजबूत ब्रांड

नीतीश कुमार का “सुशासन बाबू” वाला ब्रांड इस बार भी काम करता दिख रहा था. ख़ास तौर पर महिलाओं को ₹10,000 की सहायता ने एनडीए के पक्ष में संतुलन बना दिया. आँकड़े बताते हैं कि महिलाएँ नीतीश कुमार की योजनाओं से मजबूती से जुड़ी रहीं.

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राहुल गांधी का वोट चुरी वाला बयान

तेजस्वी यादव लगातार बेरोज़गारी पर ध्यान केंद्रित करते रहे, लेकिन राहुल गांधी के “वोट चुराने” वाले बयान ने उनका ध्यान भटका दिया. तेजस्वी यादव भी राहुल गांधी के साथ नज़र आए, लेकिन यह मुद्दा ज़मीनी स्तर पर ज़ोर नहीं पकड़ पाया और विपक्ष की ऊर्जा को बाँट गया.

विपक्षी एकता का अभाव

महागठबंधन के भीतर एकता का अभाव साफ़ दिखाई दे रहा था. सीटों का बंटवारा विवादास्पद रहा और सहयोगी दलों, खासकर वीआईपी पार्टियों, का प्रदर्शन खराब रहा. नतीजतन, महागठबंधन की ज़मीनी मशीनरी लड़खड़ा गई.

एनडीए के लिए महिलाओं का समर्थन

एनडीए के प्रति महिलाओं का झुकाव तब और भी स्पष्ट हो गया जब आंकड़ों से पता चला कि ज़्यादातर महिलाओं ने एनडीए का समर्थन किया, जबकि केवल महागठबंधन पर ही कम भरोसा था. योजनाएँ, सुरक्षा और स्थिरता, इन तीन मुद्दों ने इस समूह को एनडीए के करीब रखा.

लालू परिवार पर भ्रष्टाचार का दाग

तेजस्वी यादव और उनके परिवार पर लगा भ्रष्टाचार का दाग इस बार एक अहम हथियार साबित हुआ. चुनाव के दौरान, आईआरसीटीसी घोटाला मामले की सुनवाई हुई और एनडीए ने इसे भ्रष्टाचार की वापसी के रूप में प्रचारित किया, और जनता के एक वर्ग ने इसे गंभीरता से लिया.

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युवा मतदाताओं में विश्वास की कमी

युवा मतदाताओं ने भी निर्णायक भूमिका निभाई. बेरोज़गारी एक बड़ा मुद्दा था, लेकिन 2022-24 तक उप-मुख्यमंत्री के रूप में तेजस्वी के कार्यकाल में कोई ठोस उपलब्धि नहीं दिखी. पलायन की समस्या भी अनसुलझी रही, जिससे युवाओं का विश्वास कम हुआ.

तेजस्वी का बदलाव का मॉडल विफल

हालांकि विशेषज्ञों ने तेजस्वी यादव के चुनाव अभियान को उत्साह से भरा माना, लेकिन नतीजे बताते हैं कि उत्साह और जनादेश दो अलग-अलग चीजें हैं. बारह प्रमुख कारकों ने मिलकर ऐसा माहौल बनाया कि महागठबंधन लगभग 60 सीटों पर ही रह गया. बिहार ने बदलाव की पुकार सुनी, लेकिन सुशासन, स्थिरता और सुरक्षा पर भरोसा जताया. तेजस्वी के लिए यह न केवल एक हार है, बल्कि भविष्य की राजनीति के लिए एक कठोर सबक भी है.

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