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चाँद पर हो रही खेती? नासा के अंतरिक्ष यात्री कर रहे हैं स्पेस फार्मिंग का कमाल, जानिए कैसे बिना मिट्टी-पानी के उग रही हैं हरी-भरी फसलें

भारत के अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान अपने अनोखे प्रयोग साझा किए। उन्होंने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर रहते हुए उन्होंने मेथी और मूंग के बीज उगाए। सीमित जगह और महंगे कार्गो के कारण भोजन हमेशा चुनौती बनता है। शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष में खेती सिर्फ अंतरिक्ष यात्रियों के लिए नहीं, बल्कि पृथ्वी पर खाने का संकट झेल रहे लोगों के लिए भी उम्मीद की किरण है। यह प्रयोग अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की बढ़ती ताकत को दर्शाता है।

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के अपने सफल मिशन के बाद,  अंतरिक्ष में जाने वाले  दूसरे भारतीय , कैप्टन शुभांशु शुक्ला पृथ्वी पर वापस आ गए हैं और भारत लौट आए हैं। सोमवार शाम को, भारतीय अंतरिक्ष यात्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके आवास पर मुलाकात की और एक्सिओम-4 मिशन की सफलता के साथ-साथ भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन पर भी चर्चा की।

एक्सिओम-4 मिशन के दौरान शुक्ला ने कुल सात प्रयोग किए, लेकिन पौधे उगाना सबसे महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने पेट्री डिश में मूंग और मेथी के बीज लगाए और उन्हें स्टोरेज फ्रीजर में रखा। यह प्रयोग सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के असर को समझने के लिए किया गया था। इन पौधों को धरती पर कई पीढ़ियों तक उगाया जाएगा, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अंतरिक्ष का असर उनके पोषण, आनुवंशिकी और माइक्रोबायोलॉजी पर कैसे पड़ता है। शुक्ला ने मोदी से कहा कि यह रिसर्च भविष्य में वैश्विक खाद्य सुरक्षा की समस्या हल कर सकती है।

नासा का वेजी गार्डन

शुक्ला अंतरिक्ष में खेती करने वाले पहले नहीं हैं। नासा ने 2014 में आईएसएस पर वेजी गार्डन शुरू किया था। यह एक मिनी गार्डन है, जिसमें छह पौधे तक उगाए जा सकते हैं। इसमें अब तक लेट्यूस, चीनी पत्तागोभी, लाल रूसी केल और फूल तक उगाए गए हैं। कुछ पौधे अंतरिक्ष यात्री खा चुके हैं, जबकि बाकी धरती पर भेजे गए। इस प्रयोग का मकसद था समझना कि पौधे माइक्रोग्रैविटी में कैसे बढ़ते हैं और क्या वे अंतरिक्ष यात्रियों के लिए ताज़ा और सुरक्षित भोजन का स्रोत बन सकते हैं।

पौधे उगाने की तकनीक: हाइड्रोपोनिक्स और एरोपोनिक्स से मिला बेहतर विकल्प

अंतरिक्ष में खेती करने के लिए दो मुख्य तकनीकें उपयोग की जाती हैं। पहली है हाइड्रोपोनिक्स, जिसमें पौधे मिट्टी की जगह पोषक तत्वों वाले पानी में उगते हैं। दूसरी है एरोपोनिक्स, जिसमें पौधों की जड़ों पर पोषक तत्वों का स्प्रे किया जाता है। नासा के वेजी गार्डन में पौधों को मिट्टी जैसे माध्यम से बने तकियों में उगाया जाता है, जो पानी, पोषक तत्व और हवा का संतुलन बनाए रखते हैं। इसी दिशा में इसरो ने भी क्रॉप्स बॉक्स नाम का मिनी-ग्रीनहाउस बनाया है, जो अंतरिक्ष में पौधे उगाने की भारतीय क्षमता का परीक्षण कर रहा है।

अंतरिक्ष में पौधे उगाने की चुनौतिया

अंतरिक्ष खेती आसान नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती है माइक्रोग्रैविटी, जिसमें पौधे अपनी दिशा तय नहीं कर पाते। जड़ें नीचे और तने ऊपर नहीं बढ़ते, जिससे विकास प्रभावित होता है। दूसरी समस्या है जगह और प्राकृतिक धूप की कमी। कृत्रिम रोशनी लगानी पड़ती है, लेकिन यह ऊर्जा-खर्चीला काम है। इसके अलावा विकिरण और संदूषण का खतरा हमेशा रहता है। अगर पौधों का डीएनए बदल गया या उन पर हानिकारक जीवाणु पनप गए, तो वे मनुष्यों के लिए खतरनाक हो सकते हैं। इन मुश्किलों के बावजूद अंतरिक्ष यात्री खेती को आगे बढ़ा रहे हैं।

अंतरिक्ष में खेती का महत्व

अंतरिक्ष में पौधे उगाना भविष्य के मिशनों के लिए बेहद ज़रूरी है। लंबी अंतरिक्ष यात्राओं या मंगल पर कॉलोनी बसाने के लिए भोजन का पुनर्योजी स्रोत होना चाहिए। पौधे केवल भोजन ही नहीं देते, बल्कि पानी को शुद्ध करने और कार्बन डाइऑक्साइड से ऑक्सीजन बनाने में भी मदद करते हैं। इससे एक क्लोज्ड़-लूप लाइफ सपोर्ट सिस्टम तैयार किया जा सकता है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जो तकनीकें अंतरिक्ष में विकसित होंगी, वही धरती पर भी सूखे, बंजर इलाकों और खाद्य संकट से जूझ रहे लोगों की मदद करेंगी। इस तरह अंतरिक्ष खेती इंसानियत का भविष्य बदल सकती है।

Disclaimer: प्रिय पाठक, हमारी यह खबर पढ़ने के लिए शुक्रिया. यह खबर आपको केवल जागरूक करने के मकसद से लिखी गई है. हमने इसको लिखने में सामान्य जानकारियों की मदद ली है. inkhabar इसकी पुष्टि नहीं करता है.

Shivashakti Narayan Singh

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